ऑक्सफैम इंडिया ने भारत में कोविड-19 टीकाकरण अभियान के साथ चुनौतियों पर अपने त्वरित सर्वेक्षण के परिणामों को जारी किया है, जिसमें दावा किया गया है कि कुल जवाब देने वालों में से 30 फ़ीसदी ने धर्म, जाति या बीमारी या स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर अस्पतालों में या स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों की ओर से भेदभाव किए जाने की जानकारी दी है।

सर्वे में दावा किया गया है इसमें शामिल एक तिहाई मुस्लिम, 20 फीसदी से अधिक दलित और आदिवासियों तथा कुल जवाब देने वालों में से 30 फीसदी ने धर्म, जाति या बीमारी या स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर अस्पतालों में या स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों की ओर से भेदभाव किए जाने की जानकारी दी है।

गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘ऑक्सफैम इंडिया’ ने भारत में कोविड-19 टीकाकरण अभियान के साथ चुनौतियों पर अपने त्वरित सर्वेक्षण के परिणामों को मंगलवार को साझा किया। उसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 43 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वे टीका नहीं ले सके, क्योंकि जब वे टीकाकरण केंद्र पहुंचे तो टीके समाप्त हो गए थे।

‘सिक्योरिंग राइट्स ऑफ पेशेंट्स इन इंडिया’ शीर्षक वाली रिपोर्ट के अनुसार, नौ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें खुद को टीका लगवाने के लिए एक दिन की मजदूरी गंवानी पड़ी।

एनजीओ ने कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और भारत के टीकाकरण अभियान के ‘कुछ प्रावधानों’ के खिलाफ मरीजों के अधिकारों को शामिल करने के लिए सर्वेक्षण दो भागों में किया गया। उसने कहा कि स्वास्थ्य मंत्रालय के मरीजों के अधिकार चार्टर पर सर्वेक्षण फरवरी और अप्रैल के बीच किया गया था और इसमें 3,890 प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई थीं।

उसने कहा कि वहीं भारत के टीकाकरण अभियान पर सर्वेक्षण अगस्त और सितंबर के बीच 28 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों में 10,955 उत्तरदाताओं को शामिल करते हुए किया गया।

सर्वे में दावा किया गया है, ‘एक तिहाई मुस्लिम उत्तरदाताओं, 20 प्रतिशत से अधिक दलित एवं आदिवासी उत्तरदाताओं और कुल उत्तरदाताओं में से 30 प्रतिशत ने धर्म, जाति के आधार पर अथवा बीमारी या स्वास्थ्य की स्थिति के आधार पर अस्पताल में या किसी स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर द्वारा भेदभाव किए जाने की सूचना दी। ‘

ऑक्सफैम इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ बेहर ने एक बयान में कहा, ‘सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं में गरीब और मध्यम वर्ग को रोगियों के मूल अधिकारों से नियमित रूप से वंचित किया जा रहा है.’

देश में मरीजों को उनके अधिकारों से इनकार किए जाने को रेखांकित करते हुए, रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 74 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि डॉक्टर ने केवल उपचार लिखा या जांच करने के लिए कहा, लेकिन उन्हें उनकी बीमारी, उसकी प्रकृति और बीमारी का कारण नहीं बताया।

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