पिछले कुछ दिनों से विरोध प्रदर्शन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आदिवासियों को अनुमति नहीं मिली। इसी दौरान हसदेव अरंड के निवासी परसा कोयला ब्लॉक में दूसरे चरण की खनन मंजूरी मिल गयी जिसके बाद सैकड़ों की संख्या में आदिवासियों ने सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर छत्तीसगढ़ राज्यपाल से मुलाक़ात किया लेकिन फिर भी कोई हल नहीं निकला।

जिसके बाद अब जड़, जगल और जमीन के लिए हसदेव अरंड निवासी आदिवासी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई है। उनका कहना है कुछ दिनों में पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा दी गयी मंजूरी के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए राष्ट्रीय राजधानी पहुंचेंगे। इसके लिए कई छोटे- छोटे आदिवासी संगठन हसदेव अरंड बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले दिल्ली में एक प्रेस मीट भी निर्धारित है।

एनजीओ छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने कहा कि वे मंजूरी के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का रुख करेंगे और दिल्ली में विरोध प्रदर्शन भी करेंगे।

कार्यकर्ताओं का कहना है कि लगभग 700 लोग विस्थापित होंगे और लगभग 840 एकड़ का घना जंगल खनन परियोजना के कारण नष्ट हो जाएगा। क्षेत्र में काम करने वाली एक कार्यकर्ता बिपासा पॉल ने कहा, “… केंद्र और राज्य सरकारें, कॉर्पोरेट हितों की सेवा के लिए, इस (पहले) नो-गो क्षेत्र की सुरक्षा के मामले में पीछे हट रही हैं।”

यह मंजूरी तब मिली जब हसदेव अरंद के लगभग 250 निवासियों ने क्षेत्र में सभी खनन परियोजनाओं को रद्द करने की मांग करते हुए कोरबा से रायपुर तक 300 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा की।

मार्च करने वालों ने राज्यपाल अनुसिया उइके और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात की, जिन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि उनके अधिकारों की रक्षा की जाएगी और दस्तावेजों की जांच की जाएगी। लेकिन इसी दौरान खनन परियोजना को रद्द करने के बजाय अनुमति मिल गयी जो चिंताजनक है।

राज्यपाल अनुसिया उइके के साथ आदिवासी

सामाजिक कार्यकर्ता पॉल ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि मार्च के बाद भी राज्य सरकार ने दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच के आदेश नहीं दिए हैं. “… इस मामले में (केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय) के साथ कोई पत्राचार (नहीं किया गया है) जिससे साफ होता है राज्य सरकार और केंद्र सरकार कॉर्पोरेट को लाभ कमवाने के लिए काम कर रही है .

हसदेव अरंड मध्य भारत में 170,000 हेक्टेयर में फैले घने जंगल के सबसे बड़े सन्निहित हिस्सों में से एक है। इसमें 23 कोयला ब्लॉक हैं। 2009 में, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अपने समृद्ध वन क्षेत्र के कारण इस क्षेत्र को खनन के लिए नो-गो जोन के रूप में वर्गीकृत किया। इसे फिर से खनन के लिए खोल दिया गया क्योंकि नीति को अंतिम रूप नहीं दिया गया था।

इस क्षेत्र में हाथी की भी महत्वपूर्ण उपस्थिति है और यह एक बड़े प्रवासी गलियारे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। हसदेव अरंड वन हसदेव नदी का जलग्रहण है – महानदी की सबसे बड़ी सहायक नदी – जो बारहमासी नदी के प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण है।

यह हसदेव बांगो जलाशय का वाटरशेड भी है और छत्तीसगढ़ के चावल-कटोरा राज्य में 3 लाख हेक्टेयर दोहरी फसल वाली भूमि की सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है। अगर यह खनन होती है तो सब नष्ट हो जायेगा।


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