• अब सवाल यह उठता है कि क्या परंपरा के नाम पर क्या किसी व्यक्ति पर जबरन किसी को सम्मान देने के लिए बाध्य किया जायेगा?
  • इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति शेखर यादव ने श्री राम, श्री कृष्ण, गीता, रामायण, महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेद व्यास को सम्मान देने/सम्मान देने के लिए एक कानून लाने की बात ही क्यों कहा बाकि( सिख, जैन, स्लाम, बौद्ध ईसाई आदि ) धर्म की सम्मान की बात क्यों नहीं कहा?
  • क्या तथा कथित जबरन किसी धर्म और विशेष समुदाय के लोगो को सम्मान दिलवाने की रणनीति पर कथित असंवैधानिक कार्य किया जा रहा है ?

भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के संबंध में उल्लेख किया गया है। जो व्यक्ति को धार्मिक बाध्यता से आजादी प्रदान करता है। यह उसका व्यक्तिगत मामला की वह किसी धर्म को माने या न माने।

धर्म के मानने से तात्पर्य है व्यक्ति द्वारा अपने धर्म के प्रति श्रद्धा और विश्वासों का स्वतंत्रता पूर्वक और खुलेआम घोषित करना, प्रत्येक व्यक्ति अपने धार्मिक विश्वासों को किसी भी व्यावहारिक रूप से मान सकता है, धर्म के आचरण करने का तात्पर्य धर्म द्वारा विहित कर्तव्यों कर्मकांड और धार्मिक कृत्यों को प्रदर्शित करने की स्वतंत्रता जो उसके धर्म द्वारा विहित किए गए हो।ब शर्ते कि इसके संबंध में कोई दबाव का तत्व न हो।

अब कानून बना कर जबरन किसी धर्म को सम्मान करवाना कितना उचित है ?

भारत में यह अधिकार हर एक व्यक्ति या कहें कि नागरिकों को समान रूप से प्राप्त है। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार नागरिकों को प्राप्त 6 मैलिक अधिकारों में से चौथा अधिकार है और इनका वर्णन संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से अनुच्छेद 35 में मिलता है।

ऐसे में परम्परा के नाम पर संसद द्वारा कानून बनाकर क्या किसी को किसी धर्म और उससे जुड़े पेशे वालों को सम्मान करवाना उचित है। इन दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक कथित टिपण्णी चर्चा में बनी हुयी है।

न्यायमूर्ति शेखर यादव की खंडपीठ ने सूर्य प्रकाश की जमानत याचिका पर विचार करते हुए सोमवार को जोर देकर कहा, “संसद को श्री राम, श्री कृष्ण, गीता, रामायण, महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेद व्यास को सम्मान देने/सम्मान देने के लिए एक कानून लाना चाहिए क्योंकि वे भारत की संस्कृति और परंपरा हैं।”

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