मिहिर भोज डिग्री कालेज में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा का अनावरण किया गया। प्रतिमा के शिलापट से सम्राट मिहिर भोज के आगे गुर्जर नहीं लिखने से हंगामा शुरू हो गया। दादरी विधायक तेजपाल नागर व अन्य भाजपा नेताओ पर गुर्जर समाज के लोगो ने जमकर नारेबाजी की।

इसको लेकर प्रतिक्रिया देते हुए लोगो ने कहा कि सम्राट मिहिर भोज गुर्जर-प्रतिहार थे, और उनके साथ यह कृत्य घटिया जातिवादी मानसिकता को दर्शाता है जो निंदनीय है।

कई प्रतापी राजाओं किजाति के साथ छेड़-छाड़ करके अतीत में अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए उन्हें अपनी जाति से जोड़ा गया या फिर उनकी जाति छिपाई गयी।

1200 इसवीं के बाद उत्तर भारत के प्रमुख रजवाड़े मुस्लिमों एवं अंग्रेजों के पिठ लग्गू एवं वैवाहिक संबंध स्थापित करके समाज में अपनी सत्ता और वर्चस्व स्थापित कर रखा था। इतिहास में ऐसे कई संधि है जहाँ इस बात का सबूत है की कई भारतीय रजवाड़ों ने मुस्लिमो से रिश्ते जोड़े या फिर अंग्रेजों से संधि किया है।

इन सिक्कों पर पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी दोनो के नाम अंकित है

गोपीनाथ शर्मा इसपर कहते है  हमें मोहम्मद गौरी के समय अजमेर में चलाए गए सिक्के मिलते हैं उन सिक्को में एक और तो पृथ्वीराज चौहान का नाम अंकित है और एक ओर मोहम्मद साम का नाम अंकित है यानि कि एक ही सिक्के पर दोनों का नाम अंकित है।

यह इस बात की पुष्टि करता है कि पृथ्वीराज चौहान, मोहम्मद गौरी के आश्रित शासक के रूप में रहे होंगे इसके अलावा गोपीनाथ शर्मा यह तर्क भी देते हैं कि बाद में हम यह जानते हैं कि मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंद राज को आश्रित शासक बनाया था।

ऐसे राजनेताओं के नाम आज कथित जातिवादी संगठन हिंसा करने पर उतर आते है। वही इतिहास में शिवा जी व रणजीत सिंह क्रमश मराठा (पिछड़ा), सांसी(अनुसूचित) समुदाय से तालुक रखने वाले थे।

जिन्होंने मुगलों और अफगानों से युद्ध करके अपनी सत्ता स्थापित की थी इसके आलावा इतिहास में महाराजा छत्रसाल को छोड़कर कोई भी ऐसा प्रतापी क्षत्रिय व राजपूत राजा नहीं था जो शिवा जी व रणजीत सिंह की तरह युद्ध करके सत्ता स्थापित की थी।

अधिकतर इतिहास में उन्ही कथित क्षत्रिय राजाओं का महिमामंडल किया गया है जो या तो मुगलो से सम्बन्ध रख कर अपना राज बचाये रखते थे या फिर अंग्रेजो के पिठलग्गू बनकर राज किया था।

आज 21 वीँ सदी में जिस तरह पिछड़े, दलितों एवं आदिवासियों के महापुरषों के इतिहास के साथ छेड़-छाड़ कि घटनाये सामने आती है ये निंदनीय है यह उस घाटिया जातिवादी सोंच को दर्शाती है जिनके पूवर्ज इतिहास में तो कुछ कर न पाए, पर उनके कथित वंशज कहलाने वाले जातिवाद के नाम परअपना झूठा ढोल बजा रहे।

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