27 डॉक्टरों ने केंद्र सरकार की उस अधिसूचना को चुनौती दी है जिसके जरिए ऑल इंडिया कोटा में OBC और EWS आरक्षण लाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उसकी प्रतिक्रिया पूछी है।

सुप्रीम कोर्ट के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि इसे टालने का मतलब होगा NEET में EWS कोटे का अंत और फिर ये मामला बाकी एडमिशन टेस्ट और आगे चलकर नौकरियों में EWS आरक्षण के लिए भी नजीर बन जाएगा।

इस केस में फैसला न देना भी एक फैसला ही होगा। EWS कोटा देने के लिए लाए गए 103 वें संविधान संशोधन के लिए ये परीक्षा की घड़ी है। इस संविधान संशोधन कानून के जरिए अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन करके आर्थिक आधार जोड़ दिया गया था।

दरअसल EWS सवर्ण गरीबों को दिया जाने वाला आरक्षण है। इस मायने में EWS आरक्षण का नामकरण गलत और भ्रामक है। गरीबी के आधार पर दिया जाने वाला ये एकमात्र आरक्षण है, लेकिन सरकार ने गरीबी की जो परिभाषा तय की है वह गरीबी रेखा या BPL नहीं है।

वर्तमान में EWS के लिए आय सीमा 8 लाख रुपए सालाना रखी गई है, यानी 66 हजार रुपए तक प्रति माह कमाने वाले परिवार गरीब माने गए हैं।

यह भी विवादित है सवर्ण 66 हजार/ माह कमाने वाला गरीब है जबकि अनुसूचति जाति एवं जनजाति के लोग 2.50 लाख वार्षिक (22 हजार /माह ) से ऊपर कमाए तो गरीब नहीं ये कैसी समानता है यह भी भ्रमित करने वाली है। अब आप समझ गए होंगे कि ये विभिन्न धर्मों के मध्यवर्गीय सवर्णों के लिए लाया गया आरक्षण है।

व्यापक चर्चा के बिना संविधान संशोधन क्यों ?

संविधान संशोधन (124वां) विधेयक 8 जनवरी, 2019 को ऐसे लाया गया मानो, किसी को पहले से पता चल गया, तो राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी! दो दिन के अंदर इसे दोनों सदनों से पारित करके अनुमोदन के लिए राष्ट्रपति के पास भेज दिया गया और राष्ट्रपति भवन से अनुमोदन फटाफट आ भी गया।

ऐसा लग रहा था मानों हर कोई जल्दबाजी में है कि कोई अड़चन आने से पहले इसे पास कर दिया जाए। संविधान के मौलिक अधिकारों के अध्याय में मूलभूत बदलाव किए गए और दो उप अनुच्छेद 15(6) और 16(6) जोड़े गए और पहली बार आरक्षण में सामाजिक पिछड़ेपन के अलावा कोई आधार बनाया गया, उस पर संसद में चर्चा न होने देना आश्चर्यजनक है और सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है।

संविधान संसोधन के आकड़े कहाँ ?

इस संविधान संशोधन विधेयक के ‘उद्देश्य और कारण ‘ वाले हिस्से में जो वजहें दी गई हैं, उनके लिए कोई भी तथ्य और आंकड़ा पेश नहीं किया गया है। इसमें कहा गया है कि (हिंदी अनुवाद): जो लोग गरीब हैं वे अमीरों के साथ असमान प्रतियोगिता के कारण सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में आम तौर पर नहीं पहुंच पा रहे हैं.’ लेकिन ऐसा किस आधार पर कहा गया है, इसका जिक्र नदारद है।

केंद्र सरकार ने आज तक ऐसा कोई आंकड़ा नहीं जुटाया है कि 8 लाख रुपए से कम सालाना आमदनी वाले कितने लोग सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में हैं।

आखिर सरकार के पास इस बात का आंकड़ा तो मौजूद है कि सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में एससी, एसटी, ओबीसी का कोटा पूरा नहीं हो रहा है. फिर इनकी जगहों पर कौन बैठे हैं?

अब सुप्रीम कोर्ट सरकार से EWS कोटे के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या और उनकी हिस्सेदारी के बारे में पूछे. अभी तो सरकार ने बिना इन आंकड़ों के उन्हें 10% कोटा दे दिया है. लेकिन जाति जनगणना न होने की स्थिति में सरकार कोर्ट को आंकड़ा कहां से देगी?

बिना इन आंकड़ों के गरीब सवर्णों को आरक्षण देना कानून के नजरिए से गलत है और इसे सवर्ण तुष्टीकरण ही कहा जाएगा।

एक बात और गौर करने के लायक है। EWS से पहले के हर आरक्षण को लेकर कोई न कोई तर्क और आधार था। SC को अतीत में छुआछात का शिकार होने और ST को आदिवासी होने के कारण आरक्षण मिला।

OBC आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है। SC और ST को क्रमश: 15% और 7.5% आरक्षण आबादी में उनकी हिस्सेदारी के हिसाब से दिया जा रहा है।

ओबीसी के बारे में मंडल कमीशन ने माना कि उनकी संख्या 52% है लेकिन चूंकि SC और ST को पहले से मिलाकर 22.5% आरक्षण दिया जा रहा है और कुल आरक्षण की सीमा पर 50% की रोक कोर्ट ने लगा रखी है। इसलिए ओबीसी आरक्षण 27% ही किया जा सका।

लेकिन EWS आरक्षण 10% क्यों हैं? 5% या 15% क्यों नहीं? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। जबकि सवर्णों की संख्या ही कथित 12% की आस- पास है।

आरक्षण आर्थिक आधार गलत

अनुच्छेद 16 यानी समानता के अधिकार वाले अनुच्छेद में ही आरक्षण का प्रावधान है। इस अनुच्छेद के मूल ड्राफ्ट में हिस्सेदारी में कमी के आधार पर आरक्षण देने का अधिकार सरकारों को देने की बात थी।

संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन बाबा साहब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के आग्रह पर ही इसमें पिछड़ेपन की शर्त जोड़ी गई, जिसे संविधान सभा ने पारित भी किया। अब केंद्र सरकार ने पिछड़ेपन के साध अमीरी-गरीबी की बात जोड़ दी है।

जबकि सामाजिक पिछड़ापन का चरित्र स्थायी होता है। गरीबी और अमीरी तो बदलते रहने वाली स्थिति है। वैसे भी अमीरी से जातीय भेदभाव खत्म नहीं होता।

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(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

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