आजादी के 70 वर्ष बाद भी जब आर्थिक, सामाजिक, न्यायिक बराबरी की बात करते है तो कोई खास बदलाव नहीं है। कथित जाति आधारित अपराध, हत्या बलात्कार, सामाजिक प्रताड़ना के मामलों से अख़बार आज भी भरे पड़े है।

शिक्षा, रोजगार में जातिवाद आज भी बरकरार है। यह बराबरी समाज में न आये इसी लिए कथित तौर पर निजीकरण करने की योजना शुरु कर दिय गई है ताकि आरक्षित जातियों को उनका अधिकार देने की बाध्यता सरकार पर न रहे।

वैसे भी आरक्षित वर्ग से आने वाली जातियों को शिक्षा और रोजगार में अधिकरत NFS (नॉन फाउंड सूटेबल) या फिर इंटरव्यूज से बाहर कर दिया जाता है कई इन सीटों पर डोनेशन लेकर किसी गैर आरक्षित को लाभ दिया जाता है या फिर इन्हे खाली पड़ा रहने दिया जाता है।

उत्तर प्रदेश का 690000 शिक्षक भर्ती इन सबका सबसे ताजा उदहारण है। जहां पिछड़ा आयोग के हस्तक्षेप के बाद भी कार्यवाही की नाम में झुनझुना थमाया गया कोई भी जिम्मेदार कुछ कहने को तैयार नहीं है।

1950 में जब हमने संवैधानिक गणतंत्र को अपनाया था तब सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक और धार्मिक रूप से बहिष्कृत जाति के लोगों को मौलिक और कुछ विशेष अधिकार मिले थे।

मौलिक अधिकारों के अलावा ये विशेष अधिकार संविधान ने उन्हें दिए थे। संविधान की धारा 330, 332 और 244 के मुताबिक़ उन्हें राज्य, देश और स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया।

धारा 335 के तहत उन्हें सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में प्रतिनिधित्व दिया गया। उन्हें शैक्षणिक संस्थानों में दाख़िला लेने में भी छूट दी गई।हालांकि सामाजिक रूप से प्रताड़ना झेलने के अलावा दलितों को सरकारी संस्थानों में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।

न्यायिक व्यवस्था, नौकरशाही, सरकारी महकमों, उच्च शिक्षण संस्थाओं, उद्योग-धंधों और मीडिया में दलितों की उपस्थित लगभग नहीं के बराबर है। राजनीतिक दलों में भी दलितों के साथ-साथ भेदभाव होता है और शीर्ष नेतृत्व पर तथा-कथित ऊंची जातियों का दबदबा रहता है।

वंही हाल की रिपोर्ट से आफ हो गया देश के मात्र 10 % लोगों के पास 50% आर्थिक सम्पति है अब सोंच सकते है अगर ऐसे ही यह अन्तर बढ़ता गया तो जल्द एक एक वर्ग फिर गुलाम और भीख मांगने को कमजोर हो जयेगा।

इस तरह किसी से उसका धिकार छीनना उसके परिवार और आने पीढ़ी को अंधकार में ढकेलना किसी आतंकी संगठन से काम नहीं है जो सुनियोजित तरीके से किसी समुदाय को हानि पहुंचा रहा है .

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