भारत सरकार के तमाम दावों को शर्मसार करदेने वाली एक तश्वीर मध्यप्रदेश के रतलाम से सामने आयी है। जहां रतलाम में नगर निगम कर्मचारियों का असंवेदनशील और अमानवीय चेहरा सामने आया है। जो तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

वीडियो में साफ देखा जा रहा है कि नगर निगम के कर्मचारियों द्वारा नगर निगम के एक सफाईकर्मी की जान की परवाह ना करते हुए उसे गंदे पानी से भरी सीवरेज में बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के उतार दिया गया। यह सफाई कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर सीवरेज की सफाई के लिए बार-बार उस गहरे और गंदे पानी से भरे गड्ढे में डुबकियां लगाता रहा और जिम्मेदार उसे सफाई के लिए निर्देशित करते रहे।

मैनुअल स्केवेंजिंग (हाथ से नालों की सफ़ाई करते हुए) भारत में है प्रतिबन्ध

वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगो का गुस्सा फूट रहा है। इस पर लोगो ने कहा कि अगर हम सेंट्रल विस्टा परियोजना पर बीस हजार करोड़ का खर्च उठा सकते हैं, तो हम सफाई कर्मियों के लिए रोबोटिक उपकरण उपलब्ध कराने औरउनकी जान बचाने के लिए सुरक्षा उपकरण उपलब्ध क्यों नहीं करते। मैला ढोने की व्यवस्था मानवता पर कलंक है और हमारी जातिवादी मानसिकता को दुनिया के सामने प्रदर्शित करती है। हम उनके साथ करुणा और समान व्यवहार क्यों नहीं कर सकते?

गैरतलब है कि वर्ष 1955 के नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 के द्वारा अस्पृश्यता पर आधारित मैला ढुलाई जैसी कुप्रथाओं के उन्मूलन का प्रयास किया गया था।

वर्ष 1956 में काका कालेलकर आयोग ने शौचालयों की सफाई में मशीनीकरण की आवश्यकता को रेखांकित किया था। जिस मशीनीकरण का संशोधन आज के कानून में किया जा रहा है, उसकी कल्पना आज से छह दशक पूर्व की जा चुकी है, किंतु कल्पना को वास्तविकता तक आने में इतना समय लगा की अब तक हजारो लोगो की जान जा चुकी है।

कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन न होना

भारत में हाथ से मैला ढोने की प्रथा को लेकर वर्ष 2013 में मैनुअल स्कैवेंजर्स के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013 बनाया गया। कानूनों के निर्माण होने के उपरांत इस समस्या का अंत हो जाना चाहिए था, परंतु ऐसा नहीं हो सका। ऐसे में यह सवाल उत्पन्न होता है कि जब यह प्रथा कानूनी रूप से प्रतिबंधित की जा चुकी थी, तो यह सब कैसे हो रहा है? या तो यह कानून शिथिल है, जिसका क्रियान्वयन ही ठीक से नहीं हो पाया या फिर इस दिशा में सुधार के प्रयास ईमानदारी से नहीं किए गए?

समस्या का स्थायी समाधान :

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा वर्ष 2003 में जारी एक रिपोर्ट में वर्ष 1993 के अधिनियम की असफलताओं को रेखांकित किया गया। राष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक सर्वेक्षण के अंतर्गत 31 जनवरी, 2020 तक देश के 18 राज्यों में मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़े लगभग 48,000 लोगों की पहचान की गई, जो इस बात का संकेत थी कि कानून इस प्रथा को समाप्त करने में प्रभावी भूमिका नहीं निभा सका है।

वर्ष 2018 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश में मैनुअल स्कैवेंजिंग से जुड़े 29,923 लोगों की पहचान हुई जो देश के किसी भी राज्य में सर्वाधिक है।

सामाजिक, आíथक और जातिगत जनगणना 2011 के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 1,82,505 तथा शहरी क्षेत्रों में 12,226 हाथ से मैला ढोने वाले लोग हैं। लेकिन इनकी वास्तविक संख्या वर्तमान में इससे कहीं बहुत अधिक हो सकती है।

भारत के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सात हजार किमी से भी अधिक लंबी सीवर लाइन तथा 26 लाख से भी अधिक शुष्क शौचालय हैं जिनकी सफाई के लिए हाथ से मैला ढोने वाले लोगों की आवश्यकता होती है।

सर्वोच्च न्यायालय की चिंता

सर्वोच्च न्यायालय ने इन घटनाओ पर की चिंता जताते हुए 27 मार्च, 2014 को अपने एक आदेश में सरकार को वर्ष 1993 से मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण मारे गए लोगों की समुचित पहचान करने और उनके परिवारों को मुआवजे के रूप में कम से कम दस-दस लाख रुपये प्रति परिवार देने का निर्देश दिया था।

इस निर्णय से अब तक करीब 445 मामलों में मुआवजा दिया चुका है, जबकि 58 मामले ऐसे हैं जिनमें आंशिक समझौता किया गया है और 117 मामले अभी तक अपनी बारी की प्रतीक्षा के चलते लंबित हैं।

सबसे शर्मनाक बात यह है कि सरकार के पास कोई डाटा नहीं है। 28 जुलाई (2021) को राज्यसभा में सामाजिक न्याय मंत्री रामदास आठवले ने मल्लिकार्जुन खड़गे और एल हनुमंतैया की ओर से पूछे गए एक सवाल जवाब में बताया कि ”बीते पांच वर्षों में मैनुअल स्केवेंजिंग से किसी मौत का मामला सामने नहीं आया है.”

लेख-सर्वजीत यादव

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