गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर भूपेंद्र पटेल ने सोमवार को अकेले शपथ ली। गुजरात के मुख्यमंत्री बदलने के इस फैसले पर महाराष्ट्र में शिवसेना की ओर से सांसद संजय राउत ने ‘सामना’ में कटाक्ष किया है।

सामना संपादकीय में लिखा गया है, ” भूपेंद्र पटेल का चुनाव विधायकों की सहमति से हुआ, लेकिन भूपेंद्र को भी यह पता नहीं था कि वह मुख्यमंत्री बनने वाले हैं. बीते 4 वर्षों में उन्हें साधारण मंत्री भी नहीं बनाया गया. वे सीधे मुख्यमंत्री बन गए.

दिल्ली से नाम आया और भाजपा विधिमंडल दल ने मंजूर कर लिया. नेता के चुनाव के लिए विधायकों ने मतदान किया होता तो किसी अन्य नाम पर ही सहमति की मुहर लगी होती. कांग्रेस पार्टी में भी ऐसा ही होता है और इसे ही हमारे यहां लोकतंत्र कहना पड़ता है.”

शिवसेना ने संपादकीय में आगे लिखा है,”लोकतंत्र का, राज-काज व विकास के गुजरात मॉडल का गुब्बारा ऐसे बुलबुले की तरह अचानक फट गया है। गुजरात राज्य यदि विकास, प्रगति के मार्ग पर आगे जा रहा था तो इस तरह से रातों-रात मुख्यमंत्री बदलने की नौबत क्यों आई?

इसी तरह से उत्तराखंड, कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी कुछ ही दिन पहले बदले गए. मध्य प्रदेश में भी बदलाव किया जाएगा, ऐसे संकेत मिल रहे हैं. सिर्फ मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है वहां भी नेतृत्व परिवर्तन होगा, ऐसी जानकारी है.”

सामना संपादकीय में गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि जब सब ठीक था तो सीएम को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? संजय राउत लिखते हैं, “कहां क्या बदलना है, यह उस पार्टी का अंदरूनी मसला है।

भाखरी घुमानी ही पड़ती है, परंतु जब किसी राज्य को विकास अथवा प्रगति का ‘मॉडल’ साबित करने के लिए उठापटक की जाती है, तब अचानक नेतृत्व बदलने से लोगों के मन में संदेह पैदा होता है।

भूपेंद्र पटेल पर अब गुजरात का भार आ गया है। वर्ष भर में विधानसभा के चुनाव हैं. पटेल को आगे रखकर नरेंद्र मोदी को ही लड़ना होगा। गुजरात मॉडल कहा जा रहा है, वो यही है क्या?

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