जब ख़बर में झूठ चल सकता है तो विज्ञापन में झूठ क्यों नहीं चल सकता। जो समाज गोदी मीडिया के प्रोपेगैंडा को सच मान कर ख़बर देख रहा है उसे समाज विज्ञापन में झूठे प्रोपेगैंडा को सच मानना ही चाहिए।

उत्तर प्रदेश के विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया से आम रास्ते के नुक्क्ड़ पर बैठा हर व्यक्ति आलोचना कर रहा है सबके सामने एक ही सवाल है कि सरकार ने ऐसा क्या किया की अपना काम की फोटो नहीं छपवा सकी विज्ञापन में।

योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले अपने विकास कार्यों का प्रचार शुरू किया है। इसमें उनका एक एड कई स्थानों पर दिखा जिसका टाइटल था ट्रांसफॉर्मिंग उत्तर प्रदेश अंडर योगी सरकार। इसमें योगी आदित्यनाथ का बड़ा सा कटआउट बना है नीचे तमाम इंफ्रास्ट्रक्चर दिखाई दे रहा है। इस एड को लेकर विरोधियों ने उन्हें घेर लिया है।

पं. बंगाल की टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने इस तस्वीर को ट्वीट करते हुए दावा किया कि इसमें दिख रहा फ्लाइओवर, कोलकाता का एमएए फ्लाईओवर है. मोइत्रा ने अपने ट्विटर पोस्ट में लिखा ‘ठग योगी उत्तर प्रदेश के विज्ञापनों में कोलकाता के एमएए फ्लाईओवर, हमारे जेडब्ल्यू मैरियट पीली टैक्सियों के साथ…अपनी आत्मा या कम से कम अपनी एड एंजेसी बदल लें’.

इसके साथ ही रवीश कुमार ने तंज कसते हुए अपने सोशल मीडिया फेस बुक पर लिखा-

योगी जी को ट्रोल की परवाह नहीं करनी चाहिए।अगर बहुत टेंशन हो रहा है तो ट्विटर से ब्रेक लेकर कुछ दिनों के लिए इंस्टा पर चले जाना चाहिए। सारे लोग सोशल मीडिया पर यही करते हैं। यहां घिर जाते हैं तो वहां चले जाते हैं।

इंस्टा पर बहुत सारे नेता अपने वीडियो में बैकग्राउंड म्यूज़िक लगाकर हीरो को विस्थापित कर रहे हैं। विज्ञापन होता ही है आधा सच और आधा झूठ को सच में बदलने के लिए। इसमें कौन सी नई बात है।

विज्ञापन ही तो था जिसने 2014 में ऐसे ऐसे सपने रचे जिनका पीछा आज तक लोग कर रहे हैं। ये जो थोड़े से लोग हैं जो आपके विज्ञापन में कोलकाता के फ्लाईओवर का फोटा निकाल कर मज़ाक उड़ा रहे हैं, उन्हें भारत और भारतीयता से कोई मतलब नहीं है।

यह विज्ञापन का जादू होता है। जिस एजेंसी ने यूपी के विज्ञापन में कोलकाता के फ्लाईओवर की तस्वीर का इस्तमाल किया है उसका पेमेंट बंद कर देना चाहिए लेकिन इसे मंज़ूरी देने वाले अफसर को प्रोन्नति दी जानी चाहिए।

उसे विज्ञप्ति विभाग का प्रमुख बनाना चाहिए ताकि अख़बारों में छपने वाली विज्ञप्तियों में बदलाव आए। विवाद एक्सप्रेस के विज्ञापन को लेकर है लेकिन बाक़ी विज्ञापनों का भी यही हाल है। आए दिन अख़बारों में योगी सरकार के विज्ञापन छप रहे हैं। उनमें फोटोशॉप भले न हो लेकिन क्या वह अख़बार उन मसलों की सत्यता की जाँच का साहस कर सकता है?

योगी सरकार को मेरा सुझाव है कि विज्ञापन के लिए गोदी मीडिया को पैसे नहीं दिए जाने चाहिए। दूसरा कोलकाता की जगह मोरक्को, ढाका, क्योटो, कहीं की भी तस्वीर का इस्तमाल किया जाना चाहिए।

किसी अख़बार के संपादक की हिम्मत नहीं है कि विज्ञापन की सच्चाई छाप दे। जनता को जागरुक करना इस वक्त पत्रकारिता का सबसे बड़ा अपराध है। ऐसे अपराधियों को पकड़ने के लिए आयकर विभाग काम कर ही रहा है।

ख़बरों की समाप्ति के बाद विज्ञापनों की बारी आनी ही चाहिए। पत्रकारिता का यह स्वर्णिम दौर है। जो पत्रकारिता नहीं करेगा उसे पत्रकारिता का मान सम्मान मिलेगा और जो करेगा उसे आयकर विभाग का सम्मन मिलेगा। डाक्टरी किए बिना आप डाक्टर नहीं हो सकते लेकिन पत्रकारिता किए बग़ैर आप पत्रकार हो सकते हैं। जनता पैसे देकर अख़बार ख़रीदेगी और चैनल के पैसे देगी।

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