झारखंड विधानसभा में 8 अगस्त को हंगामे के बीच एक विधेयक पारित किया गया जिसके तहत निजी क्षेत्र में 40 हजार रुपये प्रतिमाह तक के वेतन वाली नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिये 75 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।

झारखंड राज्य निजी क्षेत्र में ‘स्थानीय उम्मीदवार रोजगार विधेयक, 2021’ के अधिनियमित हो जाने पर ऐसा सातवां राज्य बन जाएगा जहां निजी क्षेत्र में स्थानीय लोगों को रोजगार प्रदान करने वाला कानून है।

इससे पहले झारखंड विधानसभा की प्रवर समिति ने कुछ संशोधनों के साथ इस विधेयक को मंजूरी दे दी थी। इसे मार्च में बजट सत्र के दौरान पेश किया गया था और विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो द्वारा गठित छह सदस्यीय समिति के समक्ष इसे पुनरीक्षण के लिये भेजा गया था।

श्रम मंत्री सत्यानंद भोक्ता की अध्यक्षता वाली समिति ने संशोधन विधेयक में “निजी क्षेत्र” जोड़ा और यह ‘झारखंड राज्य स्थानीय उम्मीदवार रोजगार विधेयक, 2021’ की जगह अब ‘झारखंड राज्य निजी क्षेत्र में ‘स्थानीय उम्मीदवार रोजगार विधेयक, 2021’ हो गया।

संशोधित विधेयक में वेतन सीमा को पूर्व के 30 हजार रुपये से बढ़ाकर 40 हजार रुपये कर दिया गया। विधेयक में कहा गया, “प्रत्येक नियोक्ता इस अधिनियम के लागू होने के तीन महीने के अंदर निर्दिष्ट पोर्टल पर सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित सीमा के रूप में 40 हजार रुपये प्रतिमाह से कम वेतन लेने वाले कर्मचारियों का पंजीकरण कराएगा।

बशर्ते कि एक बार नामित पोर्टल विकसित और अधिसूचित हो जाने के बाद, किसी भी व्यक्ति को किसी भी नियोक्ता द्वारा नियोजित या नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि ऐसे सभी कर्मचारियों की पंजीकरण प्रक्रिया नामित पोर्टल पर पूरी नहीं हो जाती है।

विधेयक में कहा गया है, “अधिनियम की अधिसूचना की तारीख और उसके बाद प्रत्येक नियोक्ता 40 हजार रुपये के सकल मासिक वेतन या उससे कम वेतन वाली नौकरियों में 75 प्रतिशत नौकरियां स्थानीय उम्मीदवारों से भरेंगे।

समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी संगठनों के सेवा प्रदाताओं को कानून के दायरे में शामिल करने के लिये प्रावधानों में संशोधन किया गया।

यह भी प्रावधान किया गया है कि अगर कंपनियों को राज्य में प्रशिक्षित युवक-युवती नहीं मिलते हैं तो सरकार के साथ मिलकर तीन साल में ऐसे लोगों को प्रशिक्षित भी करेगी।

निजी क्षेत्रों में आरक्षण लागू करने वाले कई राज्यों में भी इस तरह का प्रावधान है, जहां स्थानीय लोगों में जरूरी कौशल नहीं होने पर कंपनियों को उन्हें राज्य सरकार के साथ मिलकर प्रशिक्षित करती है, फिर उन्हें नौकरी में रखती है।

आरक्षण हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा रहा है। यह वोट दिलाऊ भी माना जाता है, इसलिए रूप बदल-बदल कर फैसला होता रहा है।

हाल ही में हरियाणा सरकार निजी क्षेत्र में पचास हजार रुपये तक के वेतन की नौकरियों में स्थानीय निवासियों को 75 फीसद आरक्षण का कानून लाई है, लेकिन इसका कोर्ट की कसौटी पर खरा उतरना मुश्किल है।

संविधान जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है। साथ ही संविधान में प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता, कहीं भी बसने और रोजगार की आजादी का मौलिक अधिकार है।

Share.

Comments are closed.