नईदिल्ली: अफगानिस्तान में जिस प्रकार से घटनाएं घटी है उसके बाद सरकार की तारिफदारी करने वाले मीडिया को यह पता नहीं चल रहा है कि आखिर तालिबान को क्या कहा जाए ?

क्या आंतकवादी कहा जाए या कुछ ओर। जिस प्रकार से अफगानिस्तान में घटनाएं घटी उसके बाद भारत की किरकिरी दुनिया भर में हुई है। भाजपा प्रवक्ता समित पात्रा टीवी में केवल ताकते रह जाते हैं उन्हें पता नहीं चल पाता है क्या जवाब दिया जाए ?

खैर अब बात विदेश मंत्री एस जयशंकर की जाए तो आईएफएस एस जयशंकर को बड़ा काबिल माना जाता था लेकिन उन्होंने दुनिया भर में भारत की जो छवि बनी है वह काफी चिंता जनक है जिसके बाद अब केवल निराश ही हाँथ लगा है।

अब बात ब्रिक्स देश की बात करें तो इसमें कुछ देशों को छोड़कर बाकी सभी अफगानिस्तान के साथ हैं। जिसके कारण भारत अलग- थलग पड़ गया है।

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ”भारत को छोड़कर शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) के सभी सदस्य देश तालिबान के मुद्दे पर एक साथ हैं. एससीओ की बैठक 17 सितंबर को ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में होनी है.

चीन और रूस बाक़ी के अहम देश ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और पाकिस्तान के साथ अफ़ग़ानिस्तान के मसले पर समन्वय कर रहे हैं. पाकिस्तान अफ़ग़ान तालिबान के बहुत क़रीब है. तालिबान ने ख़ुद भी कहा है कि वो चीन के बेल्ट रोड प्रोजेक्ट में शामिल होना चाहता है.”

हाल ही में ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ”लेकिन सबसे शर्मनाक भारत के लिए है. विदेश नीति में अनुदार निर्णयों के कारण भारत के लिए उपजे नए हालात से डील करना मुश्किल हो गया है. नई दिल्ली शायद पाकिस्तानी तालिबान का समर्थन करे.”

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