हाईकोर्ट ने जंतर-मंतर पर आयोजित रैली में सांप्रदायिक नारे लगाने और एक धर्म विशेष के खिलाफ प्रचार के लिए युवाओं को उकसाने के मामले में आरोपी हिंदू रक्षा दल के अध्यक्ष भूपिंदर तोमर उर्फ पिंकी चौधरी की गिरफ्तारी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

जिसके बाद इन नफरती चिंटुओं की हालत ख़राब हो रही है जो भीगी बिल्ली की तरह इधर-उधर आसरा खोज रहे है लेकिन अभी तक पुलिस की पकड़ से बाहर है लेकिन इनको छुड़ाने के लिए लगातार अग्रिम जमानत के लिए अपील की जा रही है। हालंकि कोर्ट ने कहा ये लोग समाज में ज़हर है

सीजेआई रमना की सर्वोच्च अदालत में की गयी इस टिप्पणी जिसमे कहा गया कुछ पुलिस वाले सत्ताधारी दल से मिलकर काम करते हैं। जग जाहिर है कि जब तक पुलिस वालों की नकेल राजनीतिक आकाओं के हाथ में रहेगी वे हमेशा कानून के दायरे में काम करें इसकी गारंटी संभव नहीं।

ऐसे पुलिसवाले कानून को तोड़ मरोड़ कर आकाओं का उल्लू तो सीधा करते ही हैं, लगे हाथ अपना भी। इसलिये, कई भाजपा शासित राज्यों में पुलिस, सत्ताधारियों के राजनीतिक एजेंडा के चलते, इस्लामोफोबिया से बुरी तरह ग्रस्त नजर आती है। एनआरसी दौर और सांप्रदायिक तनाव की स्थितियों में यह रुझान और तीखा होकर सामने आया है।

कानपुर में दो पड़ोसी झुग्गीवालों की आपसी तनातनी में बजरंग दल के मुस्टंडों ने मुस्लिम अफसार अहमद को उसकी सात वर्षीय बेटी के सामने, पुलिस की उपस्थिति में धर्म परिवर्तन कराने के आरोप में बुरी तरह पीट दिया।

सोशल मीडिया में रोती-लिपटती बेटी की छवि के तूल पकड़ने पर वह इस शिकंजे से छूट सका। सीधे शब्दों में इसका मतलब हुआ कि पुलिस सत्ता पक्ष की विचारधारा की एजेंट बन कर रह गयी है न कि कानून और संविधान की।

दिल्ली दंगों में पुलिस को डेढ़ साल लग गए अपने उन इस्लामोफोबिक जवानों की शिनाख्त तक करने में जो दंगे के शिकार घायल मुसलमानों को सरे आम कोसते-पीटते एक वीडियो में नजर आ रहे थे। पिटने वालों में एक की दो दिन बाद अस्पताल में मौत भी हो गयी।

जेएनयू के छात्र उमर खालिद के सनसनीखेज मामले में अब अदालत के सामने खुलासा हुआ है कि उन्हें बिना जमानत यूपा में जानते-बूझते एक एडिटेड वीडियो के आधार पर बंद किया हुआ है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निशाने पर आये डॉक्टर कफील को फर्जी मुकदमों में जमानत मिलते ही रासुका में गिरफ्तार कर लिया गया। महीनों जेल में सड़ने के बाद वे हाई कोर्ट के दखल से छूट सके। वहां दंगे या आन्दोलन का अलिखित नियम है कि पुलिस मुस्लिम पक्ष का ही चालान करे।

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज, मानवाधिकार के जाने-माने पक्षधर, मदन लोकूर का सुझाव है कि कानून की ओर से आँख मूंदने वाले ऐसे पुलिस अधिकारियों को आपराधिक जवाबदेही के दायरे में लाया जाए और उनसे भारी हर्जाना भी वसूला जाए।

हो सकता है सीजेआई भी इस दिशा में न्यायिक पहल करें। लेकिन सारा ठीकरा पुलिस के सर पर फोड़ने का चलन नया नहीं है और इससे पीड़ितों की ही ठोकरें बढ़ेंगी।

जरूरत है कि स्थानीय न्यायपालिका को एफआईआर, गिरफ्तारी, जमानत, चालान, चार्ज शीट, जैसे हर मुकाम पर अपनी निगरानी और छानबीन की भूमिका सही रूप से निभाने के प्रति जवाबदेह किया जाए। यह पूरी तरह सीजेआई के अधिकार क्षेत्र का विषय है।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने दावा किया कि योगी के चार वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने 3300 ‘लंगड़ा’ एनकाउंटर किये हैं। यानी ऐसे एनकाउंटर जिनमें अपराधी को पैर में गोली मार कर लंगड़ा कर दिया जाता है।

उन्हें इतने एनकाउंटर क्यों करने पड़ रहे हैं? जाहिर है, इसीलिए, क्योंकि व्यापक जन-विश्वास/सहयोग के अभाव में उनकी कानून-व्यवस्था निरंतर दबाव में रही है।

इनपुट जनज्वार

Share.

Comments are closed.