मद्रास उच्च न्यायालय ने अखिल भारतीय कोटा (एआईक्यू) में राज्य के योगदान वाली सीटों में चिकित्सा और दंत चिकित्सा पाठ्यक्रमों में 10% आरक्षण को स्थानांतरित करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया है।

30 जुलाई, 2021 को भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत मेडिकल सीटें और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित की थीं।

केंद्र सरकार के इस निर्णय को चुनौती देते हुए डीएमके ने याचिका दायर किया था। डीएमके ने अपनी याचिका में कहा था कि तमिलनाडु में अंडरग्रेजुएट मेडिकल कोर्स के लिए अखिल भारतीय कोटे के तहत सरेंडर की गई सीट के खिलाफ छात्रों के प्रवेश के लिए केंद्र सरकार द्वारा दी गई 27 प्रतिशत सीटें स्वीकार करने योग्य नहीं हैं।

डीएमके के वकील पी विल्सन ने 3 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश संजीब बनर्जी और न्यायमूर्ति पीडी औदिकेसवालु की पीठ को बताया कि राज्य सरकार 69 प्रतिशत नहीं तो 50 प्रतिशत से कम कुछ भी स्वीकार नहीं करेगी। उन्होंने कहा था कि 50 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी के लिए, 18 प्रतिशत एससी के लिए और 1 प्रतिशत एसटी के लिए होना चाहिए। जो यहां की जनसँख्या के हिसाब से कुछ हद तक सही है।

जैसा की उच्च न्यायालय की पहली पीठ ने पिछली साल जुलाई में सिफारिश की थी। उच्च न्यायालय ने पिछले साल जुलाई में कहा था कि ओबीसी एआईक्यू सीटों में आरक्षण के हकदार हैं और इस आरक्षण को 2021-22 शैक्षणिक वर्ष में लागू करने का आदेश दिया था।

लेकिन कोर्ट के आदेश की अवमानना का दावा करते हुए, डीएमके ने इस सास अवमानना याचिका दायर की थी।

1993 के राज्य अधिनियम के अनुसार तमिलनाडु के लिए ओबीसी आरक्षण तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आधार पर 69 प्रतिशत निर्धारित किया गया था। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश संजीव बनर्जी और न्यायमूर्ति पीडी औदिकेसवालु की अध्यक्षता वाली पीठ ने की।

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