मशहूर समाजशास्त्री व अंबेडकरवादी लेखिका गेल ओमवेट का 81 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। जानकारी के मुताबिक ओमवेट काफी दिनों से बीमार चल रही थीं। वह महाराष्ट्र के कासेगांव में अपने पति भारत पाटणकर के साथ रह रही थीं। ओमवेट का जाना दलित-बहुजन समाज के लिए बड़ी क्षति मानी जा रही है।

डॉ. गेल ऑम्वेट का निधन 25 अगस्त, 2021 को हो गया। वह 81 वर्ष की थीं। वह मूल रूप से अमेरिकी प्रांत मिनिसोटा की थीं और 1970 के दशक में भारत आयीं। भारत में रहकर उन्होंने भारतीय समाज और इतिहास का गहन अध्ययन किया और करीब दो दर्जन किताबें लिखीं।उन्होंने दलित-बहुजन को अपने विमर्श का केंद्र बनाया

उनके निधन के बाद देश के दलित-बहुजन जगत में शोक की लहर है। पूर्व केंद्रीय मंत्री व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने ट्वीटर पर जारी शोक संदेश में कहा कि जानीमानी समाजशास्त्री व विपुल लेखन करने वाली लेखिका डॉ. गेल ऑम्वेट के निधन की सूचना से दुखी हूं भारत ने गैर-जातिवाद, किसानों और महिलाओं के अधिकारों की एक मजबूत आवाज को खो दिया है।

कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने ट्वीट में डॉ. गेल ऑम्वेट निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।  भारत में जाति अध्ययन की प्रणेता, गेल ने मार्क्सवादी अध्येता और कार्यकर्ता भरत पाटणकर से विवाह कर लिया।

वे मृत्युपर्यंत अपने पति के साथ उनके गाँव में रहीं। गेल पीएचडी स्कॉलर बतौर जाति और महाराष्ट्र में महात्मा फुले के आंदोलन का अध्ययन करने भारत आईं थीं। भारत में व्याप्त जाति और अछूत प्रथा ने उन्हें इतना मर्माहत किया कि उन्होंने दमित वर्गों के मुक्ति के लिए संघर्ष करने हेतु भारत में ही बस जाने का निर्णय ले लिया।

अमरीका में जन्मी भारतीय अध्येता, समाजशास्त्री और मानवाधिकार कार्यकर्ता, गेल, दलितों, ओबीसी और आदिवासियों पर उनके लेखन के लिए दुनिया भर में जानी जातीं थीं। उन्होंने विपुल लेखन किया और उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। उनके पीएचडी शोधप्रबंध ने महात्मा फुले के सत्यशोधक आंदोलन से दुनिया को परिचित करवाया।

उनकी विख्यात पुस्तक दलित्स एंड डेमोक्रेटिक रेवोलुशन  दुनिया भर के दक्षिण एशिया अध्ययन और भारत के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के तमाम विद्यार्थियों की हैंडबुक बन गई है। जाति और अछूत प्रथाओं को समझने और उनमें परिवर्तन लाने के तरीकों को जानने के लिए दुनिया भर के लोग उनकी पुस्तकों का अध्ययन करते हैं। वे एक महान फुले-आंबेडकरवादी थीं, जिन्होंने अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया। देशभर के ओबीसी, दलित, आदिवासी आंदोलन हमेशा उनकी ऋणी रहेंगे और उनसे प्रेरणा ग्रहण करते रहेंगे।

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