भारत की सम्पति केवल देश के चंद वैश्यों के हांथों में देने की योजना है जिनकी भागीदारी मात्र 01% है उनमे से भी 0.1 % को देश की सम्पति को बेंचकर आखिर सरकार क्या करना चाहती है? क्या यह आर्थिक राज्यतंत्र का उदय नहीं है? देश का नियंत्रण चंद व्यवसयियो के हाँथ में देकर जनता को आर्थिक गुलामी के दलदल में धकेला जा रहा है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को राष्ट्रीय मुद्रीकरण योजना का अनावरण किया। इसके तहत रोड, रेलवे, एयरपोर्ट, पावर ट्रांसमिशन और गैस पाइपलाइन सेक्टर्स के कम उपयोग वाली संपत्तियों की हिस्सेदारी को बेचा जाएगा।

सरकार के इस फैसले की खूब आलोचना हो रही है। नरेंद्र मोदी सरकार के इस फैसले पर भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता और किसान आंदोलन के अग्रणी नेता राकेश टिकैत ने तंज़ किया है।

मंगलवार को राकेश टिकैत ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किए गए एक ट्वीट में केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि मिट्टी की सौगंध खाने वाले आज देश बेच रहे हैं।

राकेश टिकैत ने भविष्य पर चिंता जताते हुए कहा है कि अगर बिजली और परिवहन निजी हाथों में चले जाएंगे तो भविष्य कैसा होगा, इसका अंदाज़ लगाया जा सकता है।

उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, ‘स्वदेशी के झंडेबदार आज देश के नवरत्नों को निजी हाथों में सौंपने के लिए आतुर हैं। देश मे विकास के प्रतीक बिजली, परिवहन निजी हाथों में होंगे तो भविष्य क्या होगा आप अंदाज कर सकते हैं। मिट्टी की सौगंध खाने वाले आज देश बेच रहे हैं।’

निर्मला सीतारमण पहले ही ये बात स्पष्ट कर चुकीं हैं कि राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए सरकार इस योजना पर काम कर रही है। इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2022 से 2025 तक छह हज़ार करोड़ रुपए सरकार जुटाएगी।

सरकार का कहना है कि जिन क्षेत्रों की संपत्तियों को 4 वर्ष के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर दिया जाएगा, उसका स्वामित्व सरकार के पास ही रहेगा। 4 वर्षों बाद निश्चित रूप से संपत्तियों को सरकार को वापस किया जाएगा।

इससे जाहिर है अमीर और अमीर होता जायेगा और गरीब और गरीब होता जायेगा।व्यापार में एक ही घराने के कई फर्म बनेंगी और वही खरीददारी करेंगी जिससे एक ही घराना और वर्ग के हाँथ में आर्थिक पॉवर होगी।

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