अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को पलटने की गुहार लगाई है, जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था कि स्कीन टू स्कीन कॉन्टैक्ट ही POCSO एक्ट के तहत यौन हमला माना जाएगा। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि ये बेतुका तर्क है और कोई भी ग्लव्स पहनकर अपराध कर सकता है और बच सकता है।

बता दें कि 27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले के तहत आरोपी को बरी करने पर रोक लगा दी थी, जिसमें कहा गया था कि बिना कपड़े उतारे बच्चे के स्तन टटोलने से पोक्सो एक्ट की धारा 8 के अर्थ में यौन उत्पीड़न नहीं होता।

इस दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि निर्णय ‘अभूतपूर्व’ है और ‘एक खतरनाक मिसाल कायम करने की संभावना है। अदालत ने एजी को निर्णय को चुनौती देने के लिए उचित याचिका दायर करने का निर्देश दिया था। अदालत ने आरोपी को बरी करने पर रोक लगा दी थी।

गौरतलब है कि बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के कृत्य से आईपीसी की धारा 354 के तहत ‘छेड़छाड़’ होगी और ये पोक्सो अधिनियम की धारा 8 के तहत यौन शोषण नहीं होगा।

न्यायमूर्ति पुष्पा गनेदीवाला की एकल पीठ ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को संशोधित करते हुए यह अवलोकन किया, जिसमें एक 39 वर्षीय व्यक्ति को 12 साल की लड़की से छेड़छाड़ करने और उसकी सलवार निकालने के लिए यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया था।

इसके अलावा पैरा संख्या 26 में, एकल न्यायाधीश ने कहा है कि प्रत्यक्ष शारीरिक संपर्क यानी यौन प्रवेश के बिना त्वचा-से -त्वचा संपर्क यौन उत्पीड़न नहीं है।
इस दौरान अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने अदालत में कहा कि अगर कल कोई व्यक्ति सर्जिकल दस्ताने की एक जोड़ी पहनता है और एक महिला के शरीर से छेड़छोड़ करता है, तो उसे इस फैसले के अनुसार यौन उत्पीड़न के लिए दंडित नहीं किया जाएगा बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला एक “अपमानजनक मिसाल” है .

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में शामिल दोनों मामलों के आरोपियों की ओर से अदालत में कोई पेश नहीं हुआ है। जस्टिस यू यू ललित और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि नोटिस भेजने के बावजूद आरोपियों ने पक्ष नहीं रखा इसलिए सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी उनकी पैरवी करे . अब मामले की सुनवाई 14 सितंबर को होगी सुनवाई।

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