आखिर OBC की जातिगत जनगणना से क्यों बचती रही है भाजपा? क्या उसे डर 14 % वालों का 80 % पर कब्ज़ा का भेद खुल जायेगा ?

बिहार के नीतीश कुमार के मंत्री का कहना है कि सरकार गाय, भैंस, बकरी, सहित अन्य जानवरों की तो गिनती करा सकती है लेकिन पिछड़ा वर्ग की क्यों नहीं यह बड़ा चिंताजनक है।

वंही जानकारों का कहना है कि अगर ओबीसी की जातिवार जनगणना होती है तो समाज के शीर्ष पर बैठे कथित आयोग्य सामाजिक नेतृत्वकर्ताओ की पोल खुलने का डर है।

आरक्षण के नाम पर आज भी आरक्षित समाज को कुछ नहीं मिला 70 वर्ष से अधिक हो गया। जिसका एक कारण जातिवाद है। कथित जाति के लोग इंटरव्यूज में नाम जाति देखकर अभ्यर्थियों को पास करते है जिसका परिणाम है देश के संस्थानों की प्रगति प्रतिदिन नीचे जा रही है।

ठाकुर, पंडित, बनिया, कायस्थ जिनकी संख्या महज 13 % के आस-पास है उनको 10 %EWS का आरक्षण मिला हुआ है जबकि ये पहले से 80 % पदों पर काबिज है। शीर्ष, नौकरी, शैक्षिक संस्थानों में इनकी संख्या 90 % से अधिक है इससे साफ होता है आरक्षित सीटों पर भी इनका कब्ज़ा है।

इस लिए जरूरी है सामाजिक समानता के लिए इन कथित जातियों को 14 % आरक्षित कर दिया। बाकि जातियों की जनगड़ना के हिसाब से उनका आरक्षण बढ़ाना चाहिए ताकि सभी को बराबर का हक़ प्राप्त हो सके।

उदाहरण के लिए कुछ इस तरह

वर्गकितना आरक्षण
अनुसूचित जाति (SC) जनसख्या के आधार पर
अनुसूचित जनजाति (ST) जनसख्या के आधार पर
सामान्य को जनसख्या के आधार पर
कुल आरक्षण(50% से कम)
शेष (ओबीसी को उपजाति आधारित) जनसख्या के आधार पर

इस हिसाब से 50 % आरक्षण से अधिक आरक्षण भी नहीं होगा और सबको उसका हक़ भी मिल जायेगा।

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