2011 की जनगणना के अनुसार देश कुल 30.1 लाख प्रार्थना स्थल हैं। जहां धर्म का अभिप्रय सीधा एक जाति समूह के रोजगार से है। इस तरह एक धार्मिक स्थल पर औसतन 4 लोगों का रोजगार धर्म के नाम पर चल रहा है।

इस हिसाब से अनुमानन 24 लाख हिन्दू धार्मिक स्थल है जहाँ प्रत्येक धार्मिक स्थल पर 2 ब्राह्मण पुरोहित के रूप में सेवारत है. इस तरह कुल 48 लाख ब्राह्मण पुरोहित के रूप में धार्मिक रोजगार प्राप्त किया है। अगर प्रत्येक परिवार में 5 सदस्य है तो कुल 2 करोड़ 40 लाख के आस पास प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धार्मिक रोजगार का लाभ ले रहे है, बाकि सरकारी या अन्य नौकरी में शामिल है। इस आधार पर देखा जाये तो भारत का सत प्रतिशत ब्राह्मण रोजगार प्राप्त किया है।

वंही 30.1 लाख का 4 से गुणा करते है तो 1 करोड़ 20 लाख लोग ऐसे है जो 100 % रोजगार की अपनी दूकान चला रहे है जो किसी न किसी धर्म से जुडी है।

ऐसे में जरूरी है तमिलनाडु सरकार की तरह देश के सभी धार्मिक स्थलों का राष्ट्रीयकरण करके उनकी सेवा के लिए सभी जातियों को अवसर दिया जाए जिससे सभी को धार्मिक रोजगार प्राप्त हो सके।

गौरतलब है तमिलनाडु के एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली सरकार ने हाल ही में चार दलितों समेत 24 गैर ब्राह्मण को पुजारी के रूप में नियुक्त किया। ये सभी से पहले प्रशिक्षण प्राप्त किया जिसके बाद नियुक्त हुए

सुमित सुमन नाम के यूजर लिखते हैं, “धर्म से जुड़े नौकरियों को सरकार द्वारा विज्ञापन जारी किया जाना चाहिए और ये विज्ञापन हर राज्य,जिले और ब्लॉक और गांव स्तर तक के मंदिरों के लिए होनी चाहिए। मंदिरों में पहले आम चुनाव हो और भारतीय संविधान की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए महिलाओं, अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति को मंदिरों में नियुक्ति हेतु आरक्षण प्रदान किया जाए, उसके बाद एग्जाम लेकर मेरिट के आधार पर उसका चयन किया जाना चाहिए। ऐसा करने से बाहुबलियों से बचाया जा सकता है।”

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