फिल्म ‘200-हल्ला हो’ के माध्यम से 12 साल के लंबे अंतराल के बाद फिल्मों में वापसी कर रहे दिग्गज अभिनेता अमोल पालेकर का मानना ​​है कि हिंदी सिनेमा में जाति को एक मुद्दे के रूप में शायद ही कभी उठाया जाय क्यूंकि बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं का मानना है यह पारंपरिक रूप से मनोरंजक मुद्दा नहीं है। दरसल सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाने की हिम्मत बहित काम लोगो में है।

फिल्म ‘200-हल्ला हो’ दलित महिलाओं की सच्ची कहानी से प्रेरित है, जिसने एक बलात्कारी पर खुली अदालत में हमला किया था। सार्थक दासगुप्ता द्वारा निर्देशित और दासगुप्ता और गौरव शर्मा द्वारा सह-लिखित फिल्म 200 दलित महिलाओं की नजरों के माध्यम से यौन हिंसा, जाति उत्पीड़न, भ्रष्टाचार और कानूनी खामियों के मुद्दों को छूती है।

पालेकर ने एक ईमेल साक्षात्कार में बताया, ‘इस फिल्म की कहानी में जाति के मुद्दों को उठाया गया है, जो भारतीय सिनेमा में अदृश्य रहे हैं। इस तरह के विषय परेशान करने वाले होते हैं और परंपरागत रूप से ‘मनोरंजक’ नहीं होते हैं। निर्माता अपनी सिनेमाई यात्रा के दौरान इस तरह की फिल्मों को बनाने से कतराते हैं.’

मराठी और तमिल सिनेमा में जाति के मुद्दों को सफलतापूर्वक उठाया गया है। नागराज मंजुले की ‘फंदरी’ और ‘सैराट’ और पा रंजीत की ‘काला’ और ‘सरपट्टा परंबरई’ जैसी फिल्मों में इसे दिखाया गया है।

नीरज घेवान की ‘मसान’ और ‘गीली पुच्ची’ को छोड़कर, हिंदी मुख्यधारा के सिनेमा में जाति का मुद्दा काफी हद तक अदृश्य रहा है। नेटफ्लिक्स पर आई फिल्म ‘अजीब दास्तां’ में इसे दिखाया गया है।

अमोल पालेकर ने कहा कि हिंदी फिल्म उद्योग अभी भी ‘ब्राह्मणवादी सौंदर्यशास्त्र’ से बाहर आने से इनकार करता है। उन्होंने कहा, ‘हिंदी सिनेमा अभी भी जाति के मुद्दों पर एक विशिष्ट चुप्पी बनाए रखना पसंद करता है।

हमारा फिल्म उद्योग ब्राह्मणवादी सौंदर्यशास्त्र से बाहर आने से इनकार करता है। एक प्रेम कहानी के माध्यम से जाति विभाजन के विषयों को पेश किया जाता था। हालांकि उत्पीड़न दिखाया जाता था, लेकिन उसका अंत बहुसंख्यकों को खुश करने वाला होता था।’

उन्होंने आगे कहा, ‘औरतों की कहानी सब-टेक्सट (मूल कहानी के पीछे रखा जाता था) का हिस्सा हुआ करती थीं। ओटीटी प्लेटफॉर्म के आगमन के साथ महिला केंद्रित विषयों को देखा जा रहा है। महिला पात्रों को सार्थक और प्रमुख भूमिकाएं मिल रही हैं। यह सब एक सुखद बदलाव है।’

आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘लगान’, तापसी पन्नू की ‘पिंक’ और ‘थप्पड़’ जैसी फिल्मों का उदाहरण देते हुए थियेटर, फिल्मों, टीवी और कला से जुड़े 76 वर्षीय अभिनेता का मानना है कि एक माध्यम के रूप में सिनेमा में लोगों के दिल को छूने की ‘अद्भुत शक्ति’ है।

उन्होंने कहा, ‘हमने देखा कि कैसे ‘लगान’ को सभी का प्यार मिला, हमने देखा कि कैसे ‘पिंक’ या ‘थप्पड़’ ने मिसॉजिनी (स्री जाति से द्वेष) को दर्शाया. इस तरह की फिल्मों ने मुद्दों को संबोधित किया, जिससे हम सभी को अपने पाखंड का सामना करना पड़ा.’

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