दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के रहने वाले असिफ अहमद अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के बख्तार विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं। वे पिछले चार सालों से वहां अर्थशास्त्र पढ़ा रहे थे।

लेकिन इस समय उन्हें डर के रहना पड़ रहा है। वे उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उन्हें जल्द से जल्द काबुल से निकाला जाएगा। 31 वर्षीय प्रोफेसर ने कहा, ‘मैं कोविड-19 के दौरान कश्मीर से ऑनलाइन पढ़ा रहा था।

फिर पिछले महीने जब कोरोना मामलों में कमी आई, तो हमें छात्रों की ऑफलाइन परीक्षा आयोजित करने के लिए कहा गया और हम 27 जुलाई को काबुल आए। लेकिन देश पर तालिबान के नियंत्रण के कारण चीजें काफी बदल गई हैं. हम यहां भयावह स्थिति में हैं.’

उन्होंने कहा कि वे काबुल में विश्वविद्यालय परिसर के अंदर रह रहे हैं और उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं है।

आसिफ ने कहा, ‘हमें नहीं पता कि कैंपस के बाहर क्या हो रहा है। नई दिल्ली के लिए मेरा हवाई टिकट 16 अगस्त को बुक किया गया था, लेकिन हवाईअड्डे पर अफरातफरी के कारण रद्द कर दिया गया।’

उन्होंने कहा कि काबुल में स्थिति बहुत गंभीर है। आसिफ ने कहा, ‘हमने यहां ऐसी तबाही कभी नहीं देखी। हम (कश्मीरी) चिंतित हैं। मेरी पत्नी और दो साल का बेटा कश्मीर में है और मेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। वे मेरी स्थिति जानने के लिए बार-बार फोन करते हैं। ‘

आसिफ ने कहा कि वे ईमेल के जरिये अपने दूतावास के संपर्क में हैं। उन्होंने कहा, ‘अफगानिस्तान में जो हुआ वह अप्रत्याशित था और मैं अब भी इसे समझ नहीं पा रहा हूं। ’

अफगानिस्तान में फंसे कश्मीरी चिंतित हैं, लगातार डर में जी रहे हैं और केंद्र सरकार से उन्हें वहां से निकालने की अपील की है. काबुल के बख्तार विश्वविद्यालय में फंसे तीन लोगों में विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले दो सहायक प्रोफेसर और एक प्रोफेसर की पत्नी शामिल हैं।

जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 17 अगस्त को कहा कि उन्होंने बख्तार विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले कुलगाम प्रोफेसरों को तत्काल निकालने के लिए विदेश राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन से बात की है।

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