मामला सार्वजनिक लोक उपक्रमों के निजीकरण का है। क्या निजीकरण के बाद इन उपक्रमों में आरक्षण लागू होगा?
एक सवाल यह भी कि इन उपक्रमों में काम करने वाले आरक्षित वर्गों के कर्मियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ मिलेगा? इन सवालों को लेकर पीएमओ की असंवेदनशीलता सामने आयी है।

देश के 33 सार्वजनिक लोकउपक्रमों को बेचने को तैयार है। इसकी औपचारिक घोषणा बीते 10 दिसंबर 2019 को केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर ने राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब देने के दौरान की थी।

इस तरह देश के सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण कर जनता के प्रति एक कल्याणकारी राज्य के संवैधानिक जिम्मेदारी से सरकार अपना हाथ छुड़ाती नज़र आ रही है।

यदि दलित, आदिवासी व पिछड़ा वर्ग के दायरे से देखा जाए तो इसमें दो बुनियादी सवाल हैं। पहला तो यह कि निजीकरण होने के बाद क्या इन उपक्रमों में आरक्षण लागू होगा ? दूसरा यह कि इन उपक्रमों में आरक्षित वर्गों के कर्मियों के बच्चों को क्या आरक्षण का लाभ मिल सकेगा?

कंपनियों के निजीकरण के बाद भी क्या आरक्षण बना रहेगा? संसद में सरकार ने दिया यह जवाब

इस सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि रिजर्व कैटेगरी के लोग सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के रोजगार में अपना आरक्षण खो देंगे, जिसे सरकार अपनी प्राइवेटाइजेशन नीति के तहत निजीकरण करने पर विचार कर रही है।

बता दें कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित संविधान (127वां संशोधन) विधेयक, 2021 पेश किया जो राज्य सरकार और संघ राज्य क्षेत्र को सामाजिक तथा शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की स्वयं की राज्य सूची-संघ राज्य क्षेत्र सूची तैयार करने के लिए सशक्त बनाता है।

बीते एक साल से सरकार अभी तक रही असफल  

बीते 1 जनवरी 2020 को प्रधानमंत्री कार्यालय ने खुद को इन उठते सवालों से जोड़ा है। उसने दिपम (डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टमेंट एंड पब्लिक असेट्स मैनेजमेंट) को पत्र भेजकर कहा कि वह पूरे मामले की जांच करे कि यदि निजीकरण हुआ तो आरक्षण कैसे लागू होगा?

भेजे गए पत्र में यह भी कहा गया कि यदि निजीकरण हुआ तो इन उपक्रमों में काम करने वाले आरक्षित वर्गों के कर्मियों के बच्चों को मिलने वाले आरक्षण का क्या होगा ?

जब पीएमओ को खुद कुछ नहीं पता तो योजना कौन बना रहा है ?

अब एक सवाल यह भी कि क्या पीएमओ इसके पहले संवेदनशील क्यों नहीं था कि निजीकरण से आरक्षित वर्गों के हितों पर कुठाराघात होगा?
क्या प्रधानमंत्री मोदी इन बातों से वाकई अनभिज्ञ हैं?

या सरकार कॉर्पोरेट चला रहे है जैसा की विपक्ष आरोप लगता रहा है कि प्रधान मंत्री केवल नाम के है क्यूंकि किसान नेता कई बार यह कह चुके की प्रधान मंत्री की ही नहीं भाजपा कैबिनेट में किसी की नहीं चलती है। इस सरकार को कॉर्पोरेट चला रहा है।

जब पूर्व के युपीए सरकार के दौरान निजीकरण के सवाल उठे थे, तब भाजपा ने मनमोहन सिंह सरकार के उस नीति का कड़ा विरोध किया था। तो फिर सरकार में आने के बाद स्वयं भाजपा के प्रधानमंत्री इतने महत्वपूर्ण विषय को कैसे भूल गए?

अभी तक कहां सोई थी सरकार

दरअसल, पीएमओ को अपनी संवेदनशीलता का अहसास भी तब हुआ जब देश भर के कई संगठनों द्वारा इस पर आवाज उठाये जाने लगे। कुछेक ने पीएम को पत्र भी लिखा। पत्र भेजने वालों में से एक राजस्थान की राजधानी जयपुर की स्नेहलता सांखला हैं।

प्रेस से बातचीत में उन्होंने बताया कि अब तक वह पीएमओ, नीति आयोग व दिपम को पांच बार पत्र लिख चुकी हैं कि कैसे सरकार सार्वजनिक लोकउपक्रमों में आरक्षण को लेकर उदासीन है।

उनके मुताबिक यह तो साफ है कि यदि सार्वजनिक लोक उपक्रमों का निजीकरण हुआ तो आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं होगी। इसकी वजह यह कि निजी क्षेत्र में आरक्षण को लेकर सरकार द्वारा कोई नीति नहीं बनाई गई है।

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