नयी दिल्ली, 31 जुलाई (भाषा) हाल में हुए एक अनुसंधान में कहा गया है कि किसी संक्रमित व्यक्ति में सार्स-कोव-2 वायरस के जीनोम में होने वाला उत्परिवर्तन जनसंख्या स्तर पर विविध स्वरूपों में दिखाई देता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अनुसंधान कोरोना वायरस के स्वरूपों के प्रसार और संक्रमण प्रभाव को लेकर पूर्वानुमान व्यक्त करने में ”बहुत उपयोगी” साबित होगा।

अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि व्यक्तियों और आबादी के बीच वायरस में होने वाले उत्परिवर्तनों पर नज़र रखने वालों को उन विषाणु स्थलों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है जो कोविड-19 के लिए जिम्मेदार सार्स-कोव-2 के अस्तित्व के लिए अनुकूल या प्रतिकूल हैं।

इस अनुसंधान में दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र, औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) से संबद्ध जिनोमिकी और समवेत जीव विज्ञान संस्थान, भुवनेश्वर स्थित जीवन विज्ञान संस्थान, गाजियाबाद स्थित वैज्ञानिक और अभिनव अनुसंधान अकादमी, हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-कोशिकीय और आण्विक जीवविज्ञान केंद्र (सीएसआईआर-सीसीएमबी) और जोधपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के अनुसंधानकर्ता शामिल थे।

विषाणु विज्ञानी उपासना राय ने अनुसंधान के निष्कर्षों पर कहा कि विषाणु स्वरूपों का उद्भव किसी व्यक्ति में इसके सफलतापूर्वक अपनी प्रतिकृतियां बनाने पर निर्भर है।

कोलकाता स्थित सीएसआईआर-भारतीय रसायन जीवविज्ञान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक राय ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “किसी भी वायरस के जीवन चक्र में उत्परिवर्तन एक बहुत ही सामान्य घटना है। वायरस बदलाव से गुजरते हुए किसी व्यक्ति के शरीर में बढ़ता रहता है, तो छोटे न्यूक्लियोटाइड परिवर्तन होते हैं।”

राय इस अध्ययन में शामिल नहीं थीं।

उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कोई वायरस अधिक से अधिक फैलता होता है, उसे संक्रमित व्यक्ति के शरीर के अंदर इस तरह के बदलाव करने के बहुत से मौके मिलते हैं तथा इस प्रकार भिन्नताएं सामने आती हैं।”

अनुसंधान रिपोर्ट ‘बायोआरएक्सिव’ में प्रकाशित होनी है।

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