एक प्रचलित कहावत है –

जापान में एक घर में चोर घुसा, घर के मालिक ने ग्रामोफ़ोन पर ‘किमी गा यो’ बजा दिया, राष्ट्रगान सुनते ही चोर सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया। उसने चोर को बाँधा और पुलिस बुला ली मुकदमा चला, सुनवाई हुई, फ़ैसला आया- एक महीने जेल की सज़ा। अदालत ने चोर की देशभक्ति की तारीफ़ करते हुए उसे रिहा कर दिया और जिसने राष्ट्रगान का ‘अपमान करते हुए’ चोर को बाँधा था उसे जेल भेज दिया।

यह सच है यह या पिछली सदी में जापानी देशभक्ति के अतिरेक का मज़ाक बनाने के लिए गढ़ी गई कहानी है, कहना मुश्किल है।

लेकिन वर्तमान में जो भारत में चल रहा है उससे इसके सच होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि देशभक्ति की हल्की-सी हिलोर में ही जज अपने फ़ैसलों में ‘मेरे देश की धरती सोना उगले’ लिखने लगते हैं लोग विरोध करने से डरने लगते है और विपक्ष को चिन्हित करके शक के आधार पर जेल में ठूंस दिया जाता है।

भारत में कुछ सालों ऐसे कई ‘जापानी चोर’ देखे गए, जिन्हें देशभक्ति का ‘सहारा’ मिला, जिन्होंने ‘गुड टाइम’ किंग की तरह बिताया, इन लोगों की व्यापारिक संस्थाओं में देशभक्ति की सज-धज देखते ही बनती है। कहवत भले ही जापान पर है लेकिन दुनिया के सभी देशों में अतिवादी देशभक्ति के लक्षण एक जैसे हैं- दुश्मनों को मिटाना है, इतिहास बनाना है, हमारा इतिहास, परंपरा, धर्म, संस्कृति, नस्ल आदि गौरवशाली रहे हैं, और जो इसके लिए मरने-मारने को तैयार नहीं हैं, वे देशद्रोही हैं।

चलो थोड़ी देर के दीमक पर जोर देकर सोंचते है क्या कोई ऐसा तानाशाह रहा है जो देशभक्त नहीं था। कोई एक नाम याद आता है हमको तो नहीं आता है ! तानाशाह सबसे पहले ख़ुद को देशभक्त नंबर वन घोषित करते हैं ताकि विरोधी अपने-आप देशद्रोही मान लिए जाएं। और उन्ही घुटने पर बैठाने को मजबूर कर दिया जाए।

अब जरा सोंचों इंसानों के रहने के लिए सर्वश्रेठ दुनिया के बेहतरीन देश- नॉर्वे, डेनमार्क, फ़िनलैंड, कनाडा और न्यूज़ीलैंड वगैरह- अभी तक देशभक्ति के क्षेत्र अपने आप को सिद्ध नहीं कर पाए, क्यूंकि देशभक्ति की चीख़कर, तोप दाग़कर, रो कर, बड़ी-सी परेड करके या सबसे बड़ा झंडा लहराकर साबित की जा सकती है जैसा वहां नहीं देखने को मिलता है।

भारत में दलित, आदिवासी, और अल्पसंख्यक क्या देश भक्त नहीं है क्यूंकि लगातार जो विकास के नारे दिए जा रहे या कथित कानून बनाये जा रहे है उनमे इन समुदायों के लिए तनाव उत्पन्न हो रहा है। किसी न किसी तरह से उनके रोजगार, शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा पर वार किया जा रहा है। जिन समुदायों को आज भी जातिवाद जैसे घृणित परम्परा का सामना करना पड़ा वे बहार निकल कर दूसरे समुदाय के सम्पर्क में आये।

ऊना में कुछ दलितों की गोरक्षकों द्वारा पिटाई किए जाने की घटना

कुछ लोगो ने सामाजिक बुराई के कारण अपनी मर्जी से कथित धर्म परिवर्तन किया। ऐसे धर्म परिवतर्न कानून आया जिसमे बात धर्म परिवतर्न की कही गई लेकिन अगर परिवार सहमति से भी प्रेम विवाह हो रहा हो तो तथाकथित देशभक्त गुंडे होने नहीं देते है। शिक्षा के क्षेत्र में कई फ़ेलोशिप बिना किसी जांच पड़ताल के यह कहकर बंद कर दी गई कि इससे देशद्रोहियों को बल मिलता है।

चमड़ा, और मांस का व्यवसाय करने वालों के साथ भीड़ हिंसा हुयी लेकिन आज तक न्याय नहीं मिला पीड़ितों कभी देश द्रोही तो कभी धार्मिक विरोधी कहकर ध्यान भटका दिया। जड़, जंगल की लड़ाई लड़ने वाले आदिवासियों को Unlawful Activities (Prevention) Act बनाया गया जहाँ सरकार से असहमति होने पर जेल में डालदिया गया।

इस हिंसाब देखा जाए तो पिछड़े, दलितों, आदिवासियों, और अल्पसंख्यों को दशकों पीछे धकेलने की नीति बनाई जा रही है। इससे क्या होगा मात्रा समाज के 20 % कथित नाकाबिल लोग देश भक्ति के आड़ में शीर्ष पर होंगे।

देश नागरिकों से नहीं है, नागरिक देश से हैं, ये देशभक्ति की पुख्ता स्थापना है, यानी ये वो विचार है जो भूमि और शासनतंत्र को नागरिकों से ऊपर रखता है यानी मानव नीचे और राजसत्ता ऊपर। लोकतंत्र में जनता पूछती है कि शासक ने नागरिकों के लिए क्या किया? देशभक्ति काल में नेता पूछता है, तुम देश के लिए इतना भी नहीं सह सकते?

आम तौर पर भक्त की आँखें अपने आराध्य के ध्यान में बंद रहती हैं लेकिन देशभक्त ज़्यादा चौकन्ना हो जाता है, वो देखना चाहता है कि कर्फ्यू या धारा 144 की तरह देशभक्ति पूरी तरह लागू हो गई या नहीं।

(प्रस्तुत लेख वर्तमान संचार और घटनाओं के परिदृश्य के आधार पर किसी की भवन को ठेंस पहुँचाने का उद्देश्य नहीं, – लेख नेटिजन टीम)

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