आज़मगढ़ में दलितों के साथ जो हुआ वह सबके सामने है। इससे साफ है सिर्फ समाज ही नहीं बल्कि दलित विरोधी सरकारी अमला भी है। ऐसे में सवाल उठता है क्या आजमगढ़ में एक प्रधान मुन्ना पासवान के घर को इसलिए तोड़ा गया है क्योंकि उसका रसूख और रहन सहन कथित अगड़ों से आगे था?

पुलिस पर जेसीबी से घर तोड़ने का आरोप पुलिस पर है। ग्रामीणों का कहना है कि कई थानों की पुलिस ने दलित के साथ जो तांडव किया वह कभी माफ़ नहीं किया जा सकता है। ऐन चुनाव के पहले पुलिस महकमे पर दलितों के खिलाफ जुल्म के आरोपों ने यूपी में सियासी तूफान मचा दिया है।

29 जून को, आजमगढ़ जिले के पलिया गांव में छेड़छाड़ की एक घटना की जांच करने दो पुलिस वाले आए। आरोप है कि उन्होंने प्रधान को थप्पड़ मार दिया। जवाब में प्रधान पक्ष से कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों से मारपीट की।

ग्रामीणों का आरोप है कि रात में दबिश देने आई पुलिस ने JCB से मुन्ना पासवान और पासी समाज के कुछ मकानों में को तहस नहस कर दिया और उनके जेवर और कीमती सामान लूट ले गए। ग्रामीणों ने पुलिस पर महिलाओं के साथ अभद्रता करने का भी आरोप लगाया है।

पुलिस का कहना है कि पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए इन लोगों ने खुद ही अपने घरों में तोड़फोड़ की, ताकि पुलिस पर दबाव बनाया जा सके और मारपीट वाले मुकदमे में कोई कार्रवाई न हो। आजमगढ़ पुलिस ने ट्वीट कर दावा किया है कि प्रधान और उनके साथियों ने दो पुलिसकर्मियों को बुरी तरह पीटा और वर्दी भी फाड़ दी। उसी मारपीट के केस से बचने के लिए पुलिस पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं और दबाव बनाया जा रहा है।

पुरुषों ने गांव छोड़ा, महिलाएं धरने पर

कहा जा रहा है कि तनाव के बाद से पुरुष डर से भागे हुए हैं। वहीं, महिलाएं अपने साथ हुई बदसलूकी के खिलाफ धरने पर बैठ गई हैं। महिलाओं की मांग है कि पुलिसवालों पर कार्रवाई हो।

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