जाति आधारित जनगणना के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही है कि सरकार की आरक्षण सरीखी नीतियां जाति आधारित ही होती हैं। यदि जाति की जनगणना से प्रामाणिक आंकड़े सरकार के पास होंगे तो उनसे संबंधित योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी।

देश में अभी तक 1931 के जाति के आंकड़ों के आधार पर ही योजनाएं बनाई जाती रही हैं, जो किसी भी रूप में उचित नहीं है। देश में 1931 तक सभी जातियों की गिनती होती रही। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस कार्य में रुकावट आई। 1941 के बाद जाति आधारित जनगणना का कार्य नहीं हुआ है।

जातियों की गिनती न होने के कारण यह पता नहीं लग पा रहा कि देश में विभिन्न जातियों के कितने लोग हैं? उनकी शैक्षणिक, आर्थिक स्थिति कैसी है? उनके बीच संसाधनों का बंटवारा किस तरह है और भविष्य में उनके लिए किस तरह की नीतियों की आवश्यकता है?

देश में जैसे राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग है, वैसे ही कई राज्यों में पिछड़ी जातियों के मंत्रालय भी हैं। जब मंडल आयोग की अनुशंसाएं लागू की गई थीं तो अन्य पिछड़ा वर्ग की संख्या 52 प्रतिशत आंकी गई थी। हालांकि इस संख्या पर विवाद है।

पिछड़े वर्ग के नेताओं का कहना है कि देश में उनकी आबादी करीब 60 फीसद है। जाहिर है कि यदि जातियों के सही आंकड़े सामने आते हैं तो देश एक बड़े राजनीतिक बदलाव का गवाह बन सकता है, पर इस तर्क को अनदेखा न किया जाए कि जब देश में पशुओं की गणना होती है तो फिर इंसानों की जातिगत जनगणना से परहेज क्यों होना चाहिए?

मंडल आयोग ने तो गैर-हिंदू समुदायों में भी पिछड़ी जातियों का वर्गीकरण किया है, जिसके कारण कई मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदायों को पिछड़े वर्ग में शामिल कर उन्हें भी आरक्षण की श्रेणी में शामिल किया गया। यद्यपि सैद्धांतिक तौर पर जाति प्रथा केवल हिंदू धर्म में है, लेकिन व्यवहार में भारत के सभी गैर हिंदू समुदायों को भी जाति प्रथा ने जकड़ रखा है। इसलिए धर्म परिवर्तन कर लेने के बाद भी वे सामाजिक पदानुक्रम और स्तरण की अवधारणा से मुक्त नहीं हो पाते।

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