इतिहास इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि किताबें जलाने का दो उद्देश्य रहा है। एक किताबें इसलिए जलाई जाती हैं ताकि किसी खास विचारधारा को नष्ट कर दिया जाए । इतिहास को खत्म कर दिया जाए। जानकारियों के स्रोत को नष्ट कर दिया जाए।

दूसरा किताबें प्रतीकात्मक रूप से भी जलाई जाती हैं ताकि उस में लिखे गए कंटेंट का विरोध किया जा सके। मनुस्मृति का जलाना इसी ओर इशारा करता है।

डॉ. आंबेडकर मनुस्मृति को ब्राह्मणवाद की मूल संहिता मानते थे। यह किताब द्विजों को जन्मजात श्रेष्ठ और पिछडों, दलित एवं महिलाओं को जन्म के आधार पर निकृष्ट घोषित करती है। पिछड़े-दलितों एवं महिलाओं का एक मात्र कर्तव्य द्विजों और मर्दों का सेवा करना बताती है। जबकि उनका मानना था प्रकृति ने हमे बराबर का अधिकार दिया है।

जिसको लेकर 25 दिसंबर 1927 को डॉ अंबेडकर ने पहली बार मनुस्मृति में दहन का कार्यक्रम किया था। उनका कहना था कि भारतीय समाज में जो कानून चल रहा है। वह मनुस्मृति के आधार पर है। यह एक ब्राम्‍हण, पुरूष सत्‍तात्‍मक, भेदभाव वाला कानून है। इसे खत्म किया जाना चाहिए इसीलिए वे मनुस्मृति का दहन कर रहे हैं।

मनु के इन कानूनों से अनुमान लगाया जा सकता है कि शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं पर किस प्रकार और कितने अमानवीय अत्याचार हुए हैं।

न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते । न पाषण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 61)

अर्थ – (व्यक्ति को) शूद्र से शासित राज्य में, धर्म-कर्म से विरत जनसमूह के मध्य, पाखंडी लोगों से व्याप्त स्थान में, और अन्त्यजों के निवासस्थल में नहीं वास नहीं करना चाहिए।

न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम्। न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत्॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 80)

अर्थ – किसी प्रयोजन की सिद्धि को ध्यान में रखते हुए दिया जाने वाला उपदेश शूद्र को न दिया जाये। उसे जूठा यानी बचा हुआ भोजन न दे और न यज्ञकर्म से बचा हविष्य प्रदान करे। उसे न तो धार्मिक उपदेश दिया जाये और न ही उससे व्रत रखने की बात की जाये।

खास तौर पर स्त्रियों के संबंध में मनु के आपत्‍त‍िजनक विचार

स्वभाव एष नारीणां नराणामिहदूषणम

अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति, प्रमदासु विपश्चित:

अविद्वामसमलं लोके,विद्वामसमापि वा पुनः

प्रमदा द्युतपथं नेतुं काम क्रोध वाशानुगम

मात्रस्वस्त्रदुहित्रा वा न विविक्तसनो भवेत्

बलवान इन्द्रिय ग्रामो विध्दांसमपि कर्षति !

अर्थात पुरुषों को अपने जाल में फंसा लेना तो स्त्रियों का स्वभाव ही है! इसलिए समझदार लोग स्त्रियों के साथ होने पर चौकन्ने रहते हैं, क्योंकि पुरुष वर्ग के काम क्रोध के वश में हो जाने की स्वाभाविक दुर्बलता को भड़काकर स्त्रियाँ, मूर्ख ही नहीं विद्वान पुरुषों तक को विचलित कर देती है। पुरुष को अपनी माता,बहन तथा पुत्री के साथ भी एकांत में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इन्द्रियों का आकर्षण बहुत तीव्र होता है और विद्वान भी इससे नहीं बच पाते।

अस्वतंत्रता: स्त्रियः कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम

विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे

पिता रक्षति कौमारे भर्ता यौवने

रक्षन्ति स्थाविरे पुत्र,न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति

सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत:

द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता:

इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम

यतन्ते भार्या भर्तारो दुर्बला अपि

अर्थात पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए। बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है। यौवन काल में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है।

इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है। स्त्रियों के चाल-ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करनी चाहिये। क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती है। सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते है। और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करता है।

इनपुट फारवर्ड प्रेस

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