गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के 566 मुसलमानों को पिछले पांच वर्षों में भारतीय नागरिकता दी गई है।

सरकार ने गृह मंत्री के बयान के बिलकुल विपरीत बयान देते हुए बुधवार को संसद को बताया कि सरकार के पास इस मामले में धर्म का कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं है।

सरकार ने बताया कि जिन लोगों को नागरिकता दी गई है उनका डेटा धर्म के आधार पर तैयार नहीं किया जाता। उन्होंने आगे बताया कि इन तीन देशों के करीब 19,000 नागरिकों के साथ-साथ श्रीलंका और म्यांमार के लोगों को भी 2014 से भारतीय नागरिकता दी गई है।

गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय द्वारा राज्यसभा में उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2014 से अब तक कुल 18,999 लोगों को भारतीय नागरिकता दी गई है, जिसमें 15,000 बांग्लादेश से हैं।

बांग्लादेश से इतने लोगों को नागरिकता 2015 में हस्ताक्षरित भूमि सीमा समझौते (एलबीए) के कारण दी गई। जिसके माध्यम से दोनों देशों के बीच एन्क्लेव का आदान-प्रदान किया गया था।

इन 18,999 लोगों में से 15,036 लोग बांग्लादेश से हैं, उनमें से 14,864 लोगों को एलबीए पर हस्ताक्षर करने के बाद नागरिकता प्रदान की गई है। चूंकि ये लोग पहले से ही भारतीय क्षेत्र में रह रहे थे, इसलिए केवल 172 बांग्लादेशियों को इस अवधि के दौरान भारत आने के बाद व्यक्तिगत आधार पर नागरिकता दी गई। एमएचए के आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान 2,935 पाकिस्तानी, 914 अफगान, 113 श्रीलंकाई और एक म्यांमार राष्ट्रीय को भारतीय नागरिकता दी गई।

राय ने सीपीआई के सदस्य केरल के सोमापारसाद के लिखित प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी साझा की, जिन्होंने इन देशों से दी गई नागरिकता के धर्म-आधारित विवरणों को जानना चाहा था।

11 दिसंबर, 2019 को राज्यसभा में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) पर बहस के दौरान गृह मंत्री शाह ने कहा था, “इस कानून में नागरिकता प्रदान करने के प्रावधान हैं। जिसे हटाया नहीं जा रहा है।

पिछले पांच वर्षों में 566 से अधिक मुसलमानों को भारतीय नागरिकता दी गई है।” बाद के मीडिया साक्षात्कारों में, शाह ने इस संख्या को 600 के करीब बताया था।

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