देश में दलितों के नाम पर राजनीती तो हुयी पर दलितों के लिए काम किसी पार्टी ने नहीं किया। चुनावी समय दलितों के लिए सावन के सोमवार की तरह है। जो भी दलित को खुश करेगा सत्ता उसकी होगी।

लेकिन सावन के माह और चुनावी दौर खत्म होने का बाद स्थित दोनों की एक जैसी होती है। दलितों के घर खाना खाया जाता है बाद उन्ही से निवाला छीना जाता है , जिनके पैर छूते है उन्ही के पैर तोड़े जाते है। जिकी आवाज पर सब दौड़े आते है उन्ही की आवाज बंद कर दी जाती है।

राजस्थान में नागौर ज़िले के करणू गाँव में दो दलित युवकों को महज़ संदेह के आधार पर बड़ी बेरहमी से पीटा गया, उनके गुप्तांगों में पेट्रोल डाला गया, उन्हें यातनाएं दी गईं इससे आप सोंच सकते है दलितों की सामाजिक व्यथा क्या है ?

आज दलित हिंसा पशु हिंसा से भी ज्यादा गई गुजरी है एक गाय को मारने पर कम से कम अधिकारी सुनता है और कार्यवाही होती है लेकिन दलितों के मामले पुलिस दर्ज न करे इसमें कोई बड़ी बात नहीं है।

चार दिन पुरानी इस घटना का वीडियो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो सनसनी फैल गई, पुलिस हरकत में आई और गुरुवार को इस घटना के विरोध में दलित समाज के लोगों ने नागौर में बड़ा प्रदर्शन किया।

पुलिस के अनुसार इस मामले में अब तक सात लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है और पीड़ित विसाराम और उनके चचेरे भाई पन्ना राम की मेडिकल जाँच करवा ली गई है।

दोनों पीड़ित युवक नायक बिरादरी से हैं। नायक समाज के प्रदेश उपाध्यक्ष राकेश नायक ने मीडिया से कहा है कि ‘ऐसा सुलूक तो जानवरों के साथ भी नहीं किया जाता। हमारे लोग धरने पर बैठे हैं। हमे सर्व समाज का समर्थन मिला है। हम तब तक ये लड़ाई जारी रखेंगे जब तक पीड़ितों को इंसाफ़ ना मिल जाये.’

पीड़ित विसाराम ने पुलिस को तहरीर दी है कि ‘वे 16 फ़रवरी को अपने चचेरे भाई के साथ सर्विस सेंटर पर मोटर साइकिल की सर्विस के लिए गए थे।

वहाँ थोड़ी देर बाद भींव सिंह और उनके साथियों ने आकर हमें पीटना शुरू कर दिया। उन लोगों ने हम पर पैसे चोरी करने का आरोप लगाया और हमारे साथ मारपीट की.’

उनके चचेरे भाई पन्ना राम ने पत्रकारों से कहा, “कोई 100-200 रुपये की चोरी की बात हो रही थी। और उसी बात पर उन्होंने क़रीब एक घंटे तक हमें मारा-पीटा। वे हमें तब तक मारते रहे, जब तक हम बेहोश नहीं हो गए.”

दलितों के अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्त्ता भंवर मेघवंशी ने कहा, “दलितों पर अत्याचार के मामले नागौर ज़िले में पहले भी सुर्खियों में रहे हैं। इसके पहले साल 2015 में एक विवाद को लेकर डांगावास गाँव में बड़ा हुजूम इक्क्ठा हुआ था और भीड़ ने पाँच दलितों की हत्या कर दी थी। इस मामले में पुलिस ने 40 लोगों को गिरफ़्तार किया था.”

यह ऐसी इकलौती घटना नहीं

2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान ऐसे कई मामले सामने आये है जो राजस्थान में दलितों की स्थिति को खोल कर रख दिया। ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की राज्य संयोजक सुमन देवठिया बताती हैं,

‘बीते करीब एक महीने में राज्य के शेखावाटी इलाके (चुरु, झुंझुनू और सीकर) से आठ दलित बच्चियों के साथ बलात्कार की खबरें आई थी।

इसी तरह बीकानेर और बाड़मेर में भी महिलाओं के साथ ज्यादती हुई . नागौर में गैस कनेक्शन देने के बहाने दलित महिला की अस्मत लूटी गई। अकेले सवाई माधोपुर जिले में दुष्कर्म के 17 मामले सामने आए हैं जिनमें से अधिकतर पीड़िताएं दलित हैं.’

ऐसी घटनाओ पर चिंता व्यक्त करते हुए वे आगे कहती है , ‘ये तो वे मामले हैं जो जैसे-तैसे दर्ज़ करवाए जा सके। असलियत तो न जाने कितनी भयावह होगी, जबकि ऐसे हजारो मामले है जो दर्ज नहीं होते है’

किशन मेघवाल कहते हैं, ‘इस ज़ुल्म के लिए हमारा सामाजिक ढांचा जिम्मेदार है। हम पर अत्याचार करने वाले जो समुदाय समाज में दबंग हैं, राजनीति में भी उनका उतना ही प्रभाव है।

इसके अलावा इन समुदायों की एकतरफा वोटिंग होती है, इसलिए कोई भी दल इन्हें नाराज़ नहीं करना चाहता। यही कारण है कि सत्ता में चाहे जो आए दलितों की स्थिति में सुधार नहीं आता।’

मेघवाल की मानें तो पिछले कुछ दिनों में प्रदेश के अधिकतर जिलों से दलितों पर अलग-अलग रूप में कई हमले हुए हैं। मीडिया से शिकायत जताते हुए वे कहते हैं, ‘एक पशु मर जाए तो अख़बारों की सुर्ख़ियां बन जाती हैं।

लेकिन हम दो दिन से आंदोलन कर रहे हैं, किसी ने हमारी बात उठाने की जहमत नहीं उठाई। स्थानीय मीडिया के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है.’ इसके अलावा वे दलित पैरोकारों की भूमिका पर भी बड़ा सवाल खड़ा करते हैं।

किशन मेघवाल कहते हैं, ‘दलितों के अधिकतर स्वघोषित नेता कांग्रेस समर्थक हैं इसलिए भाजपा सरकार के समय तो सभी सड़क पर आकर विरोध करते हैं।

लेकिन कांग्रेस सरकार में वे हमारी आवाज़ नहीं बन पाते.’ हाल ही की एक रैली का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जब तक भीड़ ख़ामोश थी, नेता साथ रहे. लेकिन जैसे ही सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाजी शुरु हुई, वे भाग खड़े हुए.

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