झारखंड: पुलवामा आतंकी हमले को एक साल हो गया है। इस हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे। यह जवान सीआरपीएफ की 76 बटालियन से थे।

शहीदों में एक नाम विजय सोरेंग का भी था। विजय सोरेंग झारखंड के गुमला जिले के मायाटोली गांव के रहने वाले थे। जहां अब उनकी पत्‍नी विमला देवी अपने चार बच्‍चों के साथ रहती है।

विमला देवी की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि वो सड़क किनारे सब्जियां बेचने को मजबूर हो गई हैं। हालांकि हमले के बाद सरकार द्वारा शहीदों के परिवारों के लिए कई तरह के वादे किए गए थे।

विमला देवी की सब्जियां बेचते हुए एक तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। ये तस्वीर पूरे देश और व्यवस्था को शर्मसार कर रही है।

इस तस्वीर में विमला सड़क किनारे बैठी सब्जी बेच रही हैं। शहीद की पत्नी की इस तस्वीर को एक ट्विटर यूजर ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को टैग करते हुए ट्वीट किया था।

इस ट्वीट को हेमंत सोरेन ने रीट्वीट किया और सिमडेगा के डिप्टी कमिश्नर (डीसी) को टैग करते हुए लिखा “शहीद देश की धरोहर होते हैं।

कृपया इनकी हर सम्भव मदद करते हुए ज़रूरी सभी सरकारी योजनाओं का लाभ जल्द से जल्द पहुँचाते हुए सूचित करें। ध्यान आकृष्ट कराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद प्रशांत भाई। सरकार की तरफ़ से इन्हें हर सम्भव मदद की जाएग।

UP: दूध बेचने को मजबूर शहीद का बुर्जुग पिता।

पुलवामा हमले में वाराणसी के शहीद रमेश यादव भी हैं। जिनका परिवार आज किल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर है। सरकारी सिस्टम इतना खराब हो चुका है।

कि शहीद के घर वालों को अभी तक पर्याप्त आर्थिक मदद नहीं मिल सकी है। जिसके कारण शहीद दूध बेचकर गुजर-बसर कर रहे हैं।

सरकार के आश्वासन के बाद भी गांव में शहीद स्मारक, मूर्ति और शहीद के नाम पर गांव के प्रवेश द्वार दरकार है।

भाजपा ने बनाया था चुनावी मुद्दा।

आपको बता दें की मौत को लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने खूब भुनाया। नतीजा ये हुआ कि पिछली बार के मुकाबले बीजेपी को कहीं ज्यादा सीटें मिलीं और फिर से केंद्र में बीजेपी की सरकार बन गई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन शहीदों की याद में बनने वाले स्मारक बनाना भूल गए। सरकार द्वारा जवान की उपेक्षा की वजह से आज शहीद का परिवार दुखी है।

वहीं शहीदों के सम्मान में गाये जाने वाले गीत-‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।’ की राह देख रहा है।

आज भी बेटे की याद में बंद नहीं होते शहीद की मां के आंसू

शहीद रमेश यादव की पत्नी, बड़ा भाई और बुजुर्ग पिता दूध साइकिल से ले जाते हैं। शहीद की मां से जब बेटे के नाम पर सरकार द्वारा सहयोग करने के बारे में बात की गई तो उनके आंसू बंद होने का नाम नहीं ले रहे थे।

शहीद रमेश का ढाई साल का बेटा घर के प्रांगण में खेल रहा था। शायद उसे अभी भी ये मालुम नहीं कि उसके पिता कहां हैं। क्योंकि हमले की वक्त उसकी उम्र मात्र डेढ़ वर्ष की ही थी। घर की हालत भी कुछ ठीक नहीं है।

हमले के 1 साल बीतने को हैं शहीद के गांव में उनके नाम पर न तो शिलापट्ट लगाई गई, न शहीद स्मारक बना, न ही मूर्ति की स्थापना हुई और न ही शहीद के नाम पर गांव में प्रवेश द्वार बना।

यहां तक की गांव के सड़क ही हालत तक नहीं बदली। जैसे की तैसी अभी भी गांव की हालत बनी हुई है।

Share.

Comments are closed.